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चौपालः दिखावे की मदद

वर्तमान समय में देखा गया है कि जिस प्रकार कोरोना के कारण देश में हर वर्ग अत्यंत प्रभावित हुआ, जिसका सीधा प्रभाव उन लोगों पर दिखा जो प्रतिदिन कमा कर किसी तरह अपना पेट भरते थे।

पूर्णबूंदी में उन्हें हर प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ा। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण दुख भोजन से वंचित हो जाना और किसी तरह जी भर सकने लायक खाना खोज पाना रहा।

‘नेकी कर दरिया में डाल’- यह कहावत तो हम सभी बचपन से सुनते आ रहे हैं, लेकिन आज के दौर में इसके अर्थ को बदल कर ‘नेकी कर और सोशल मीडिया में डाल’ के रूप नई पहचान मिली है। समाज में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जो संपन्न हैं और दो वक्त का भोजन आराम से प्राप्त करते हैं। दूसरे वे जो किसी प्राकृतिक आपदा के नतीजे में एक वक्त का खाना भी बड़ी मिन्नतों से प्राप्त करते हैं। वर्तमान समय में देखा गया है कि जिस प्रकार कोरोना के कारण देश में हर वर्ग अत्यंत प्रभावित हुआ, जिसका सीधा प्रभाव उन लोगों पर दिखा जो प्रतिदिन कमा कर किसी तरह अपना पेट भरते थे। पूर्णबूंदी में उन्हें हर प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ा। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण दुख भोजन से वंचित हो जाना और किसी तरह जी भर सकने लायक खाना खोज पाना रहा। सरकार ने अपने स्तर से कदम उठाए, वहीं आम लोगों ने भी भावनात्मक और आर्थिक सहयोग कर भूखे लोगों तक जरूरत की वस्तुओं को पहुंचाने का काम किया।

यह आपसी एकता की मिसाल दिखाती है कि इस तरह लोगों ने नैतिक मूल्यों के काव्य के रूप एक नया अध्याय लिखा। लेकिन इसी समय कुछ ऐसे लोगों को भी देखा गया, जिन्होंने इस अवसर पर भी अपनी मानवता की चादर को अलग रख कर दिखावे की पगड़ी को सिर पर बांध लिया। वे लोग इतना भी नहीं समझ पाए कि आज वे जिनकी मदद कर रहे हैं, वे वक्त की ठोकर से घायल वे लोग हैं जो स्वाभिमान से जीवन को जीते हैं और आज की भयावह स्थिति से परेशान है। उन्होंने देश को बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया है। इसलिए किसी व्यक्ति का सहयोग करते समय उसके साथ फोटो खींचना और सोशल मीडिया के रास्ते दुनिया को यह दिखाना कि आप उनकी मदद कर रहे है, यह कितना नैतिक है।
’ऋषि कुमार, प्रयागराज

बेलगाम विस्तारवाद
यूरोप के पच्चीस देशों के 1080 सांसदों ने एक पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें इजराइल से आग्रह किया गया है कि पश्चिमी तट के कुछ हिस्सों को विधिवत् इजराइल में मिलाने की प्रक्रिया पर पुनर्विचार करे, ताकि फिलस्तीनी समस्या का सौहार्दपूर्ण हल निकाला जा सके। यही बात संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनिओ गुतारेस ने भी कही है। मगर क्या इन सुझावों पर इजराइल गौर फरमाएगा? ऐसा नहीं लगता। पिछले दिनों जब इजराइल के राजधानी को तेल-अवीव से बदल कर विवादास्पद येरुसलम किया, तब भी दुनिया के विरोध को दरकिनार कर दिया गया। पश्चिमी तट को इजराइल ने 1967 के युद्ध में हड़पा था। विश्व को उम्मीद थी फिलस्तीनियों के साथ सौहार्दपूर्ण शांति समझौते में इजराइल कालांतर में इसे खाली कर देगा। मगर अब लगता है फिलस्तीन का बचा कुछ जमीन भी हड़प लिया जाएगा और वहां के लोगों को खानाबदोश जिंदगी जीने के लिए विवश कर दिया जाएगा।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

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