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चौपालः कितनी निर्भयाएं

मध्यप्रदेश के मंदसौर में तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली आठ साल की बच्ची को जिस दरिंदगी से हवस का शिकार बनाया गया उसने निर्भया कांड की याद ताजा कर दी है।

Author July 3, 2018 4:22 AM
प्रतीकात्मक चित्र

मध्यप्रदेश के मंदसौर में तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली आठ साल की बच्ची को जिस दरिंदगी से हवस का शिकार बनाया गया उसने निर्भया कांड की याद ताजा कर दी है। अगर पिछली घटनाओं से सबक लिया होता तो शायद ऐसी वहशी वारदात की पुनरावृत्ति नहीं होती। लेकिन हमारे तंत्र की यही सबसे बड़ी खामी है कि वारदात होने के बाद वह कुंभकरण की नींद से जागता है और आनन-फानन में मेघनाथ की तरह सिंह गर्जना कर जनता को फिर उसके हाल पर छोड़ देता है। जिस प्रदेश ने बारह साल या उससे कम उम्र की बालिका से सामूहिक बलात्कार के दोषी को फांसी देने का कानून सबसे पहले बनाया हो वहां इस तरह की वारदात बेहद अफसोसनाक है। मध्यप्रदेश बालिका पढ़ाओ-बढ़ाओ अभियान का पुरोधा रहा है मगर उसी में बालिकाओं के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं आखिर रुक क्यों नहीं पा रही हैं? कहीं कानून को लागू करने या अपराध से निपटने की हमारी रणनीति में कमी या अन्य सामाजिक-राजनीतिक या भौगोलिक कारण तो इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं, इस बिंदु पर भी सोचे जाने की आवश्यकता है।

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वैसे महिला उत्पीड़न के मामले में मध्यप्रदेश का रिकार्ड अच्छा नहीं रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकडों के अनुसार 2017 में मध्यप्रदेश बलात्कार के मामले में देश में अव्वल नंबर पर रहा है। देश में दर्ज कुल दर्ज 38947 बलात्कार के मामलों में सर्वाधिक 4882 मामले मध्यप्रदेश में दर्ज हुए। इसके बाद उत्तर प्रदेश (4816) और महाराष्ट्र (4189) का नंबर आता है। दिल्ली अगर महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित शहर है तो मध्यप्रदेश महिला अत्याचार के मामले में सबसे भयावह प्रदेश बनता जा रहा है। एक तरफ जहां प्रदेश में बीते वर्षों में कुल अपराधों में कमी आई है वहीं महिलाओं और बच्चियों के साथ यौन शोषण के मामलों में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई है।

आबादी के लिहाज से देश के पांचवें नंबर के राज्य पर बलात्कार के मामले में अव्वल होने का ठप्पा लगना वहां की जनता और शासन के लिए शर्मिंदगी की बात है। लोगों में कानून का भय समाप्त होता जा रहा है। यह पुलिस की नाकामी को दर्शाता है। केवल दूर दराज के शहर-कस्बों में नहीं बल्कि इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर जैसे बड़े शहरों में भी महिलाएं यौन उत्पीड़न की शिकार हो रही हैं। बीते मंगलवार को द थॉमस रिसर्च एंड फाउंडेशन की रिपोर्ट में यौन हिंसा के मामले में भारत को सबसे असुरक्षित दस देशों में पहले नंबर पर होने की बात भले ही सरकार ने नकार दी हो लेकिन मंदसौर की घटना तो सर्वे के निष्कर्ष की पुष्टि करती हुई ही प्रतीत होती है।

जो समाज अपनी बहन-बेटी बच्चियों की आबरू की हिफाजत नहीं कर सकता क्या उसे सभ्य कहलाने का क्या हक है! आखिर कब तक हवस के भेड़िये मासूम बच्चियों की जिंदगी बर्बाद करते रहेंगे और लोग मूक दर्शक बने रहेंगे? सिर्फ कठोर कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, उसका क्रियान्वयन भी सुनिश्चित होना चाहिए। न्याय होना ही नहीं, होता हुआ भी दिखना चाहिए। इससे पहले कि जनता का आक्रोश ज्वालामुखी बन फूट कर किसी अप्रिय स्थिति का गवाह बने, शासन-प्रशासन ऐसे ठोस कदम उठाए जिनसे प्रदेश बलात्कार में नंबर वन के कलंक से मुक्त हो और महिलाएं तथा बच्चियां यहां निर्भीक होकर स्वाभाविक जीवन जी सकें।

’देवेंद्र जोशी, महेशनगर, उज्जैन

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