ताज़ा खबर
 

चौपाल: दोहरे पैमाने

कहने को बेटा- बेटी एक समान कहा जाता है, लेकिन परवरिश में इतना अंतर क्यों होता है? एक स्त्री आज भी वर्षों पुरानी कुरीतियों, यौन शोषण, बलात्कार, छेड़छाड़ आदि की शिकार है। इसी तरह की हिंसा की शिकार महिलाएं अंदर ही अंदर घुटती रहती है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन वास्तविक सुरक्षा एक स्त्री के अंदर ही है।

Girl childलिंग भेद की शिकार बच्‍ची। फाइल फोटो।

भारतीय समाज और संस्कृति में जहां स्त्री को देवी का स्वरूप माना जाता है, वहां क्यों वास्तविक स्थिति इसके विपरीत नजर आती है? क्यों एक स्त्री को आज भी एक पैर की जूती के समान समझा जाता है? आंतरिक या बाहरी तौर पर इस हिंसा के अनेक रूप हैं। क्यों एक स्त्री को कमजोर या निर्बल होने का एहसास करवाया जाता है? पुरुष प्रधान समाज अपना पौरुष दिखाते समय शायद यह भूल जाता है कि उसे इस दुनिया में लाने वाली भी एक स्त्री ही है। एक बेटी को ही उसकी मां संस्कारों का पाठ पढ़ाती है, पर बेटों को सभ्य इंसान बनने के लिए प्रेरित क्यों नहीं किया जाता? ‘हिंसा की परतें’ (दुनिया मेरे आगे, 17 नवंबर) लेख इसी जरूरी विषय पर यथोचित विश्लेषण करता है। बेटियों को जितनी हिदायत दी जाती है, उतनी बेटों को दी जाए, तो समस्या ही पैदा न हो।

कहने को बेटा- बेटी एक समान कहा जाता है, लेकिन परवरिश में इतना अंतर क्यों होता है? एक स्त्री आज भी वर्षों पुरानी कुरीतियों, यौन शोषण, बलात्कार, छेड़छाड़ आदि की शिकार है। इसी तरह की हिंसा की शिकार महिलाएं अंदर ही अंदर घुटती रहती है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन वास्तविक सुरक्षा एक स्त्री के अंदर ही है। जरूरत है उसे पहचानने की, अपने अस्तित्व को जानने की, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने की, हिंसा के प्रति डट कर आवाज उठाने की और खुद आगे आने की।
’अमनप्रीत कौर, पंजाब विवि, चंडीगढ़

लोकतंत्र के लिए

आमतौर पर शांतिप्रिय माना जाने वाला देश थाइलैंड पिछले कुछ समय से कठिन दौर से गुजर रहा है। विरोध करती जनता सड़कों पर है। प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट सत्ता से चिपकी और यथार्थ से दूर बैठी है और देश के राजा अपनी अलग दुनिया में गोते लगा रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों पर राजा की चुप्पी जनता को अखर रही है। विरोध की सबसे बड़ी वजह देश के प्रधानमंत्री और भूतपूर्व थलसेना अध्यक्ष प्रयुथ छान-ओ-छा के प्रशासन से लोगों की नाराजगी है। प्रयुथ पिछले छह सालों से सत्ता पर काबिज हैं। पिछले चुनावों में उन्हें जीत तो मिली थी, लेकिन प्रदर्शनकारी उस चुनाव को निष्पक्ष व पारदर्शी नहीं मानते।

विरोध प्रदर्शनों का एक कारण प्रयुथ सरकार का तानाशाही रवैया भी है, जिसके चलते पिछले साल उन्होंने विपक्षी पार्टी प्रतिबंध भी लगा दिया था। भ्रष्टाचार के तमाम आरोप प्रयुथ सरकार पर लगते रहे हैं। आर्थिक मोर्चे पर भी सरकार विफल रही है। कोविड महामारी के दौरान न सिर्फ अर्थव्यवस्था लाचार हुई, बल्कि पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं और सबसिडी के अभाव में सरकार की काबिलियत पर भी सवाल उठे हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि सविधान में सशोधन कर इसे लोकतांत्रिक और लोककेंद्रित बनाया जाए।
’भूपेंद्र सिंह रंगा, पानीपत, हरियाणा

Next Stories
1 चौपाल: जैव-विविधता की जगह
2 चौपाल: शांति की राह
3 चौपाल: प्रदूषण का कठघरा
यह पढ़ा क्या?
X