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चौपालः मनुष्यता के बरक्स

किसी भी शिशु का जो पालक होता है, उसकी जाति आमतौर पर वही हो जाती है। फिर भी शिशु के पालक की जाति के आधार पर जाति तय करने की बेमानी परंपरा बनी हुई है।

भारतीय समाज में सर्व धर्म समभाव का एक आदर्श स्थापित होना ही चाहिए।

भारतीय समाज में सर्व धर्म समभाव का एक आदर्श स्थापित होना ही चाहिए। यहां धार्मिक संकीर्णताओं की वजह से ही धर्मों के बीच जिस तरह मानवीयता पिसती है, वैसे में इन धर्मों की जरूरत ही क्या है! मनुष्य की केवल एक ही जाति ‘मनुष्य’ है और सभी मानव मात्र का धर्म केवल ‘मनुष्यता’ या ‘इंसानियत’ है। कोई खुद को और समाज को जाति और धर्म के खांचों में बांटता है, तो वह मनुष्यता का दुश्मन ही है।

विडंबना यह है कि हम सबके मन में बचपन से ही जातिगत भेदभाव और धार्मिक वैमनस्यता भरा जाता है और हम ऐसे ही हो जाते हैं। लोगों को यह सामाजिक प्रशिक्षण देने वाले धर्म के ठेकेदारों को अपनी दुकानदारी चलानी होती है, धर्मरूपी आडंबर से उन्हें करोड़ों रुपए मुफ्त में उगाहना होता है। सवाल है कि जाति को आखिर किसने बनाया? निश्चित रूप से इस समाज के कुछ बहुत शातिर, बदमाश और धूर्त लोगों ने धीरे-धीरे इसे व्यवस्था का रूप दे दिया। मान लिया जाए कि ईश्वर हमें एक नन्हे शिशु के रूप में इस धरती पर भेजता है, तो क्या वह उस शिशु के माथे पर उसकी जाति का नाम लिख कर भेजता है?

किसी भी शिशु का जो पालक होता है, उसकी जाति आमतौर पर वही हो जाती है। फिर भी शिशु के पालक की जाति के आधार पर जाति तय करने की बेमानी परंपरा बनी हुई है। जबकि इसी जातिगत भेदभाव और फूट की वजह से यह देश हजारों सालों तक गुलाम रहने को अभिशप्त रहा। लेकिन अभी भी भारतीय समाज में बहुत से मूढ़ और जड़बुद्धि लोग करोड़ों की संख्या में हैं, जो जाति और धर्म-आधारित संकीर्णताओं में बुरी तरह से जकड़े हुए हैं। ये जाति और धर्म बिल्कुल व्यर्थ और इस समाज और देश को बर्बाद करने का सबसे बड़ा कारक है। जाति-व्यवस्था और धार्मिक कुव्यवस्था का जड़ उच्छेद जरूरी है।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र

हवा में जहर
‘हवा में प्रदूषण’ (संपादकीय, 21 अक्तूबर) पढ़ा। राजधानी दिल्ली समेत पूरे एनसीआर की हवा फिर से जहरीली हो चुकी है। वायु गुणवत्ता सूचकांक में हवा का स्तर बेहद खराब हो गया है। वायु गुणवत्ता सूचकांक 286 दर्ज किया गया। पराली जलने की वजह से राजधानी में पीएम 2.5 का स्तर 19 फीसद पर पहुंच गया है। दिल्ली की हवा में पीएम का लेवल 300-330 के स्तर तक पहुंच चुका है। लोगों के लिए स्वस्थ सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। अक्तूबर के महीने में ही जब हवा सबसे खराब श्रेणी पहुंच गई है तो आगे और भी मुश्किल हो सकती है। दिवाली आने में अभी काफी वक्त है। लेिकन अगर सावधानी नहीं बरती गई तो काफी मुश्किल होगी। एक तो राजधानी में बढ़ते कोरोना के मामले परेशानी का सबब हैं, ऊपर से खराब हवा। दोहरी मार झेल रही हैं राजधानी। तमाम प्रयासों के बावजूद दिल्ली में वायु प्रदूषण ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। सरकार और संबंधित अधिकारियों को स्थिति को सामान्य बनाने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए।
’नीतीश कुमार पाठक, औरंगाबाद, बिहार

 

 

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