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चौपाल: स्वतंत्रता के मायने

मुफ्तखोरी की राजनीतिक संस्कृति ने भारत में नैतिकता और नागरिक बोध पर चोट पहुंचाई है। बुनियादी रूप से रूढ़िवादी समाज की हामी से भारतीयों के अवचेतन में आधुनिक लोकतंत्र संभव नहीं हैं।

भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार अपने पिछले कार्यकाल से ही सरकारी दफ्तरों के कामकाज में सुधार लाने के प्रयास करती रही है।

स्वतंत्रता के मूल्य, मानव अधिकारों के लिए सम्मान और सार्वभौमिक मताधिकार द्वारा हम सार्थक लोकतंत्र को रेखांकित करने वाले राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के एक पक्ष को तो सुनिश्चित करते आए हैं, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए हानिकारक भाषण का मुकाबला करना कैसे सीखें यह भी चुनौती हैं।

आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को केवल बहुपक्षवाद और कानून के शासन पर सरकारों की ढोंगी नैतिकतापूर्ण विचारधारा से अगर अभिव्यक्ति की आजादी का दमन होता हैं, जरूरी सवालों से बचने के लिए सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में दरार और सिकुड़ते नागरिक स्थान की मौजूदा पृष्ठभूमि बन रही है, उस पर चिंता लाजिमी है।

लोकतंत्र का अंतरराष्ट्रीय दिवस दुनिया में लोकतंत्र की स्थिति को तो बतलाता है, पर हमें क्या? हम भारतीयों के तो सभी राजनीतिक दल घनघोर अलोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से संचालित हैं। जाहिर है, जब दलों में ही लोकतंत्र की जगह परिवारवाद, भाई-भतीजावाद है तो भारतीयों के लोकजीवन में लोकतंत्र कहां से आएगा।

मुफ्तखोरी की राजनीतिक संस्कृति ने भारत में नैतिकता और नागरिक बोध पर चोट पहुंचाई है। बुनियादी रूप से रूढ़िवादी समाज की हामी से भारतीयों के अवचेतन में आधुनिक लोकतंत्र संभव नहीं हैं।
’भंवरकिशन विश्नोई, जयपुर, राजस्थान

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