चौपालः डर का रोग

कोरोना के दुष्परिणामों के कारण लोगों की नींद उड़ने लगी है तो व्यक्ति एकाकी होने लगे हैं। घर का वातावरण भी बोझिल होता जा रहा है और बाहर निकलते ही डर लगने लगता है।

मौजूदा संकट के दौर में अब महामारी का सीधा असर अवसाद के रूप में देखा जा रहा है।

मौजूदा संकट के दौर में अब महामारी का सीधा असर अवसाद के रूप में देखा जा रहा है। पिछले दिनों देश में कोरोना के असर या डर के कारण मौत को गले लगाने के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिली है। युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक के आत्महत्या करने के कई मामले आ चुके हैं। यह प्रवृत्ति दुनिया के अधिकतर देशों में देखी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट में कोरोना के दूसरे असर यानी बेरोजगारी, नौकरी छिनने, वेतन नहीं मिलने, समय पर नहीं मिलने या वेतन कटौती, नौकरी जाने का तनाव, उद्योग धंधे बंद होने या बाजार में मांग नहीं होने या इसी तरह के अन्य कारणों से लोग तेजी से अवसाद का शिकार होते जा रहे हैं।

दरअसल 2019 के आखिरी दो माह और उसके बाद 2020 में शुरूआती महीनों से ही सारी दुनिया को चारदिवारी में कैद कर देने वाली इस महामारी ने सब कुछ ठप्प करके रख दिया। पूर्णबंदी के कारण सब कुछ थम गया तो जिस तरह की भयावह तस्वीर सामने आई है और मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, उसमें यह सीधे-सीधे आम लोगों की मानसिकता को प्रभावित कर रहा है और तेजी से अवसाद घर करता जा रहा है। देखा जाए तो कोरोना महामारी ने जीवन के लगभग सभी मोर्चों पर सारी दुनिया को हिला कर रख दिया है।

इससे पैदा हुई स्थिति ने इस अवधारणा तक को चुनौती दे दी है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और लोगों को समूह के स्थान पर अब एकाकी या यों कहें कि अपने परिवार तक सीमित कर दिया है। किसी से भी मिलने से डर तो दूर की बात, अधिकांश समय घर में बंद या फिर थोड़ा बुखार-खांसी या इस तरह की स्थिति होते ही कोरोना का भय सताने लगता है। दूसरी ओर कोरोना पॉजिटिव पाए जाने पर अस्पताल की या इलाज की जो तस्वीर सामने आ रही है और जिस तरह मरीज घर-परिवार, मिलने जुलने वालों से पूरी तरह काट दिया जाता हा, उसकी वजह से भी लोगों का मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ रहा है और उसके ठीक ठीक होने की अवधि में ज्यादा समय लगता है।

दरअसल, लोग कोरोना से इस कदर भयक्रांत हो गए हैं कि वे इसके बारे में सोच-सोच कर ही अवसाद में जाने लगे हैं। देखा जाए तो कोरोना से लड़ने के लिए जिस तरह का सकारात्मक माहौल बनना चाहिए, वह दुनियाभर के देशों में अभी तक नहीं बन पा रहा है। सुबह उठते ही सबसे पहले कोरोना प्रभावितों के आंकड़े सामने आते हैं, फिर उनमें से मरने वालों के आंकड़े होते हैं और उसके बाद फिर ठीक होने वालों के आंकड़े होते हैं। इसके साथ ही जिस तरह से कोरोना प्रभावित को अस्पताल ले जाया जाता है, संक्रमित व्यक्ति की मौत के बाद शव के साथ जिस तरह की स्थिति आती है, उसके दृश्य लोगों के भीतर घबराहट भर देते हैं।

कोरोना के दुष्परिणामों के कारण लोगों की नींद उड़ने लगी है तो व्यक्ति एकाकी होने लगे हैं। घर का वातावरण भी बोझिल होता जा रहा है और बाहर निकलते ही डर लगने लगता है। इससे अवसाद के सामान्य लक्षण बैचेनी, नींद नहीं आना, नकारात्मक विचार आदि तो अब आम होता जा रहा है। ऐसे में मनोवैज्ञानिकों और मनोविश्लेषकों के सामने चिकित्सकों से भी अधिक चुनौती उभर कर आई है। जब यह तय है कि अभी लंबे समय तक हमें कोरोना के साथ ही जीना है तो हमें सोच में सकारात्मकता लानी होगी।
-राजेंद्र्र प्रसाद शर्मा, जयपुर, राजस्थान

 

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