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चौपालः प्रतिभा की पूंजी

‘देश बदल रहा है’ यह वाक्य खुद को धोखा देने जैसा लगता है। सच तो यह है कि ‘देश भटक रहा है’ और इसके जिम्मेदार आइआइटी, आइआइएम आदि जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के छात्र हैं।

Author Published on: March 30, 2017 2:36 AM
सच तो यह है कि ‘देश भटक रहा है’ और इसके जिम्मेदार आइआइटी, आइआइएम आदि जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के छात्र हैं।

‘देश बदल रहा है’ यह वाक्य खुद को धोखा देने जैसा लगता है। सच तो यह है कि ‘देश भटक रहा है’ और इसके जिम्मेदार आइआइटी, आइआइएम आदि जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के छात्र हैं। वैसे, कसूर इनका भी नहीं है। भारत देश ही ऐसा है, पहले इसे गोरों ने लूटा और आज भी गोरे ही लूट रहे हैं, बस तरीका अलग है। सच तो यह है आइआइटी और आइआइएम जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं पर पश्चिमी देशों की नजरें गड़ी रहती हैं। अच्छा शहर, बेहतर सुख- सुविधाएं, करोड़ों का पैकेज देकर देश के कीमती छात्रों को बुला लिया जाता है और वे हंसी-खुशी चले भी जाते हैं। वे उस देश को छोड़कर जाते हैं, जिसने उन्हें इस काबिल समझा, उस विद्यालय, कॉलेज, टीचर, प्रोफेसर को छोड़कर जाते हैं जिन्होंने उन्हें इतना काबिल बनाया। वैसे यह बात केवल सुंदर पिचाई और इंद्रा नूई तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका की तकनीकी दुनिया में भारतीयों की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है और यह बात हमें खुशी भी देती है और दुख भी।

वर्तमान में पश्चिमी देश हमसे आगे हैं, तो हमारी गलती की वजह से आगे हैं। अमेरिका पूरी दुनिया पर राज करता है, लेकिन हमें खुशी इस बात की है कि पूरे अमेरिका पर भारतीय ‘राज’ करते हैं (जैसे भारतीय मूल के गूगल के सीईओे सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला, पेप्सी की सीईओ इंदिरा नूई)। जब हम पिचाई, नूई या नडेला, (सनडिस्क) कंपनी के सीईओ संजय मेहरोत्रा आदि को याद करते हैं तो खुशी महसूस होती है, सीना चौड़ा हो जाता है। लेकिन बाद में यही खुशी अफसोस में भी बदल जाती है यह सोचकर कि आखिर जिस प्रतिभा का उपयोग ये लोग पश्चिमी देशों में कर रहे हैं, अगर उसे भारत जैसे देश में इस्तेमाल करते, जहां से इन लोगों ने शिक्षा प्राप्त की, तो यह देश भी कहां से कहां पहुंच जाता!

अमेरिका में लगभग एक तिहाई स्टार्टअप भारतीय शुरू कर रहे हैं। इतने स्टार्टअप वहां रह रहे दूसरे सात गैर-अमेरिकी समुदाय मिलकर भी नहीं कर पा रहे हैं। 2011 के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में भारतीय समुदाय सबसे ज्यादा औसत सालाना आमदनी वाला समूह है। अमेरिका में रह रहे भारतीय साल में 86,135 डॉलर कमाते हैं जबकि वहां की औसत आय 51,914 डॉलर सालाना है। भारत आज भी उसी पायदान पर खड़ा है जहां पहले था, बस पायदान का रंग बदल चुका है, वह भी वैश्वीकरण के कारण। हर देश का भविष्य उस देश के युवा होते हैं, लेकिन हमारे देश के युवा या तो कहीं गुम हो गए, या फिर बेहतर सुख-सुविधाओं का लालच देकर कोई उन्हें उठा कर ले गया!
’कामिल सैफी, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली

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