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चौपालः निवेशकों को झटका

देश की अर्थव्यवस्था को पिछले कई महीनों से भूकंप की तरह छोटे-छोटे झटके लगते आ रहे हैं। इसकी वजह कई हो सकती हैं, चाहे कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हो, या फिर बढ़ती महंगाई या रुपए में गिरावट।

Author October 4, 2018 3:13 AM
देश की एक गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी ‘आइएलएंडएफएस’ (इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड) ने अपने निवेशकों का पैसा वापस करने से मना कर दिया, जिसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था में खलबली मच गई।

निवेशकों को झटका

देश की अर्थव्यवस्था को पिछले कई महीनों से भूकंप की तरह छोटे-छोटे झटके लगते आ रहे हैं। इसकी वजह कई हो सकती हैं, चाहे कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हो, या फिर बढ़ती महंगाई या रुपए में गिरावट। सरकार ऐसी मुसीबतों का सामना कर ही रही थी कि इसी बीच वित्त बाजार के क्षेत्र से ऐसी बुरी खबर आई जिसने देश के छोटे निवेशक से लेकर सरकार तक की नींद उड़ा दी। देश की एक गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी ‘आइएलएंडएफएस’ (इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड) ने अपने निवेशकों का पैसा वापस करने से मना कर दिया, जिसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था में खलबली मच गई। दरअसल, कंपनी निवेशकों से पैसे लेकर देश में चल रही सरकारी और गैर सरकारी परियोजनाओं के लिए कर्ज देती है और इसके बदले परियोजनाओं के मालिकों से ब्याज सहित पैसे वापस लेकर निवेशकों को लौटाए जाते हैं।

पिछले कुछ दिनों पहले जब निवेशकों ने अपने पैसे वापस मांगे तो कंपनी का कहना था कि ‘हमारे द्वारा दिए गए ऋण का भुगतान हुआ नहीं है जिसकी वजह से वह निवेशकों को पैसा दे नहीं पा रहे हैं’। इसके बाद बड़े-बड़े निवेशक जैसे- एलआइसी और देश के कई छोटे-बड़े बैंक सकते में आ गए। इसके बाद रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और वित्त मंत्रालय द्वारा कुछ कड़े फैसले लिए गए। मगर सवाल यह है कि देश की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी नियामक संस्था आरबीआइ जो पूरे बाज़ार पर नज़र रखती है, आखिर उसकी नींद इतने देर के बाद क्यों खुली? जब पानी सर से गुजर गया है तब जाकर कंपनी के पुराने निदेशक मंडल को हटा कर सरकार ने नए सदस्यों को कमान सौंपी। सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए कि किसी भी हाल में कंपनी को डूबने से बचाया जाए और फिर से पटरी पर वापस लाया जाए।

पीयूष कुमार, नई दिल्ली

बाल मजदूरी का दंश

देश में बाल मजदूरी बड़ी बुराई और समस्या बनी हुई है। पांच से चौदह साल तक के बच्चे अपना सब कुछ त्याग कर काम में खुद को इस तरह झोंक देने को मजबूर होते हैं जहां से उबर पाना असंभव हो जाता है। बच्चे देश का भविष्य होते हैं, लेकिन यहां हमारा आने वाला भविष्य ही असुरक्षित है। बच्चों के अधिकारों के बारे में अब तक जितने घोषणापत्र जारी हुए हैं उनमें बच्चों को अच्छी शिक्षा और बेहतर जीवन जीने के अधिकारों के साथ-साथ हर तरह के शारिरिक शोषण से बचने का भी अधिकार शामिल है। लेकिन जब बच्चों को छोटी उम्र से ही बाल मजदूरी के दुष्चक्र में घिरने को मजबूर होना पड़ जाए तो इन अधिकारों का क्या मतलब रह जाता है। इसका एकमात्र कारण लोगों की आर्थिक मजबूरी और उनकी गरीबी है, जो न चाहते हुए भी लोगों को उनके अधिकारों का त्याग करने पर मजबूर कर देती है। बच्चों का विकास परिवार के साथ रहने से होता है, लेकिन कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जो परिवार का जीवन बचाने के लिए खुद का जीवन त्याग देते हैं।

जूली कुमारी, उत्तम नगर,नई दिल्ली।

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