If not stop then mob lynching will become a big challenge for the unity of india - चौपालः बड़ी चुनौती - Jansatta
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चौपालः बड़ी चुनौती

बदलते भारत में आज एक बड़ी चुनौती आ खड़ी है, मॉब लिंचिंग अर्थात भीड़ की हिंसा। आज हमारा समाज हर छोटी-बड़ी घटना पर आक्रमक हो जाता है।

Author August 7, 2018 4:13 AM
आज हमारा समाज हर छोटी-बड़ी घटना पर आक्रमक हो जाता है। यह बढ़ती हुई आक्रामकता जब भीड़ का रूप ले लेती है तो कानून से ऊपर उठ कर तथाकथित अपराधी को मृत्यु दंड दे देती है।

बड़ी चुनौती

बदलते भारत में आज एक बड़ी चुनौती आ खड़ी है, मॉब लिंचिंग अर्थात भीड़ की हिंसा। आज हमारा समाज हर छोटी-बड़ी घटना पर आक्रमक हो जाता है। यह बढ़ती हुई आक्रामकता जब भीड़ का रूप ले लेती है तो कानून से ऊपर उठ कर तथाकथित अपराधी को मृत्यु दंड दे देती है। कथित बच्चा चोरी और गोहत्या की आड़ में हो रही मॉब लिंचिंग पर राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेक रहे हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह एक सामाजिक अपराध है जो दो समुदायों के बीच द्वेष पैदा कर रहा है। यदि जल्द ही इस पर रोक नहीं लगाई गई तो यह अपराध देश की एकता के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।

पारसमणि, राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली

अपनी भाषा

इस सच्चाई से हम सब परिचित हैं कि राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदी का कोई विकल्प नहीं। दुख तब होता है जब अपनी संकीर्ण सोच के चलते आज देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग हिंदी की उपेक्षा करके अपनी-अपनी बोलियों को पुष्ट करने में लगे हैं। अपनी बोली से हमारा एक स्वाभाविक लगाव होता है और होना चाहिए। लेकिन हमें याद रखना होगा किक्या अपनी-अपनी बोलियों को इतना समर्थ बना सकते हैं कि उनमें विज्ञान, प्रौद्योगिकी, विधि जैसे विषयों को सरलता से संपूर्ण रूप से प्रकट कर सकें? यह संभव नहीं क्योंकि अभी तक हम हिंदी को इस स्तर पर नहीं पहुंचा पाए हैं कि वह अंग्रेजी से पूरी तरह टक्कर ले सके।

बहरहाल, हम सब अगर उस दिशा में ठोस प्रयत्न करेंगे तो मंजिल अधिक दूर नहीं है। हां, इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम अपनी बोली को भूल जाएं। अपनों से अपनी बोली में न बोलने वाले लोग अजायबर के प्राणी लगते हैं। इतना जरूर है कि जब दूसरे लोग मौजूद हों तो हमें सिर्फ उसी भाषा में बात करनी चाहिए जिसे सब समझते हों। दरअसल, हमें अपने-अपने सपनों का नहीं बल्कि बापू के सपनों का भारत बनाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। याद रहे, हिंदी (हिंदुस्तानी) को संघ की राजभाषा बनाना भी बापू का एक सपना था।

सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, दिल्ली

हमारी जिम्मेदारी

हमारे दिन का एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया खा जाता है। वक्त मिलते ही हम फेसबुक, व्हाट्सप और इंस्टाग्राम जैसे ऐप देखने लगते हैं। कई बार तो घंटों इन्हीं ऐप्स पर बिताते हैं। सब जानते हैं कि यह वक्त की बर्बादी है, पर क्या करें, लत छूटती ही नहीं! हमारी दिमागी सेहत पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। लेकिन अब फेसबुक और इंस्टाग्राम पर जल्द ही एक ऐसा टूल आने वाला है, जिसकी मदद से आप तय कर सकते हैं कि इन ऐप्स पर कितना समय बिताएंगे। यह भी तय कर सकेंगे कि सोशल मीडिया को कितना वक्त देना है। जैसे ही आपका समय खत्म होगा, ऐप से आपको एक ‘रिमाइंडर’ आ जाएगा।

दिसंबर 2017 में फेसबुक ने एक ब्लॉग प्रकाशित किया था जिसमें उसके प्लेटफॉर्म पर बहुत ज्यादा समय बिताने से पड़ने वाले बुरे प्रभावों का जिक्र था। कुछ और अध्ययनों से भी यह बात सामने आई है कि दूसरों के मुकाबले ‘लिंक्स’ पर चार गुना ज्यादा ‘क्लिक’ करने वाले और ‘पोस्ट’ को दो गुना ज्यादा ‘लाइक’ करने वाले लोगों की दिमागी सेहत पर अधिक बुरा असर पड़ता है। नया टूल लाने का कदम तो अच्छा है, लेकिन देखना होगा कि इसका कितना फायदा लोगों को मिल पाता है। हमें अपनी जिम्मेदारी दरअसल खुद ही उठानी होगी।

विपिन डागर, सीसीएस यूनिवर्सिटी कैंपस, मेरठ

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