ताज़ा खबर
 

लहरों पर सफर

आदि-काल से हमने विभिन्न नायकों को अपना आदर्श माना है। राजनीतिक संदर्भ में भी एक प्रकार से हम सब लहरों के बहाव में बहने के आदी हो चुके हैं।

सूचना प्रसारण मंत्रालय ने दिशा निर्देश जारी कर सभी प्राइवेट टीवी चैनलों को कोरोना के लिए बनाए गए हेल्पलाइन नंबर को दिखाने को कहा है। (फोटो – पीटीआई)

आदि-काल से हमने विभिन्न नायकों को अपना आदर्श माना है। राजनीतिक संदर्भ में भी एक प्रकार से हम सब लहरों के बहाव में बहने के आदी हो चुके हैं। बिना किसी लहर के हम किसी भी बात को लेकर किसी निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंच पाते। दरअसल, जब सामने कोई लहर होती है, तो हमें अपने दिल और दिमाग पर किसी भी प्रकार के मूल्यांकन का बोझ नहीं ढोना पड़ता। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नरम दल और गरम दल की लहरें चलायमान रहीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नेहरू से लेकर मोदी तक के कार्यकाल में अलग-अलग लहरें दिखाई दी। लहरों का इतिहास साक्षी है कि हर लहर में हमने अपने-अपने पसंदीदा नेताओं का दामन पकड़ कर लहरों की ही सवारी की है।

हालांकि विभिन्न राज्यों में अलग-अलग क्षत्रपों की लहरें भी अपने करतब दिखाती रहीं। लेकिन अब लहरों के नए स्वरूप से हम दो-चार हो रहे हैं। वैश्विक स्तर पर कोविड-19 की लहर ने सारे संसार में कहर बरपा दिया है। अब इसकी तीसरी लहर का अंदेशा मुंह बाए खड़ा है। संसार की तुलना में हम अधिक भावुक और संवेदनशील मनोवृत्ति के होते हैं, लिहाजा हम जाने-अनजाने अलग-अलग दौर की अलग-अलग लहरों की सवारी करने को बाध्य होते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लहरों का स्वरूप संस्थागत न होकर व्यक्तिगत हो जाता है। ऐसे में स्वस्थ लोकतंत्र के हिमायतियों के लिए यह एक अतिरिक्त चिंता का विषय बन जाता है।

कुछ भी कहा जाए, लेकिन हम भारतीय प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अलग-अलग दौर की अलग-अलग लहरों से प्रभावित होते आए हैं। धर्म-संस्कृति के क्षेत्र में भी हर दौर में अलग-अलग देवत्व को प्राप्त महामानवों की लहरों का दौर रहा है। जैसे-जैसे हम विज्ञान और तकनीकी की लहर से सराबोर होते गए, वैसे-वैसे मुख्य रूप से राजनीतिक लहरों के आधार पर ही देश के विकास की गति मुकाम पाती गई। राजनीति में तो स्थिति यहां तक अजीबोगरीब हो गई है कि अगर किसी की लहर न हो तो हमारा यह निश्चय करना मुश्किल हो जाए कि आखिर वोट किसे देना है! बिना किसी मुखौटे के राजनीतिक सफलता दिवास्वप्न की भांति ही मानी जाती है। यानी बिना मोहरे के सेहरा नहीं बंधता।

मुद्दे की बात यह है कि लहर हमारा मानस सुनिश्चित करती है। जब तक कोई लहर न हो, तब तक उससे संबंधित बात पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना हमारे लिए आसान नहीं होता। इस बात को कुछ यों भी कहा जा सकता है कि जब तक आगे वाली भेड़ रास्ता नहीं पकड़े, तब तक हमें आगे चलने का रास्ता ही नहीं सूझता। वैसे भी कल तक हमें परदेसियों ने हांका… और अब हमारे अपने ही हमें हांक रहे हैं। दरअसल, जब तक हम भेड़चाल के मोहपाश से मुक्त नहीं होंगे, तब तक अपनी दुर्दशा को विधि के विधान के अनुरूप मानते रहेंगे। पता नहीं कब हम अपनी राह पकड़ेंगे? यकीन मानिए, जब हम अपनी राह पकड़ लेंगे तब दुनिया को राह दिखा देंगे।
’राजेंद्र बज, हाटपीपल्या, देवास, मप्र

विवेक की संगत

संगत और अनुशासन, ये दोनों ही शब्द हमारे जीवन मे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हम जब छोटे होते हैं, तभी से किसी न किसी की संगत में रहते हैं। बचपन से ही अनुशासन में रहने का पाठ पढ़ते हैं। ये दोनों ही हमारे जीवन काल में हमारे साथ चलते है। संगत से तात्पर्य है, किसी का साथ जो हमें अपने जन्म से ही प्राप्त हो जाता है। जब हमारा जन्म होता है, तब हमें मां-बाप का साथ मिलता है और अनुशासन भी मिलता है। उनका साथ हमें अपने जीवन की पहली सीढ़ी पार कराता है। धीरे-धीरे जब हम अपने जीवन की दूसरी सीढ़ी चढ़ते हैं, तब हमारी संगत और अनुशासन में वृद्धि होती है। इस अवस्था में हमारी संगत बिगड़ने से हम डगमगा जाते हैं।

हमने देखा होगा कि जब बच्चे स्कूल जाते हैं, तब उसे बहुत सारे बच्चों का साथ मिलता है। उनके साथ वह हंसता-बोलता है, खेलता है। वे उसके सहपाठी बनते हैं। अपने अध्यापकों से हम अनुशासन सीखते हैं। अगर हम अनुशासन में रहते हैं तो हम जिंदगी की महारत हासिल कर लेते हैं। हमें एक ओहदा प्राप्त होता है। लेकिन इस महारत को प्राप्त करने में हमारी संगत का भी प्रभाव पड़ता है।

हमारी संगत हमें बिगाड़ सकती है और बना भी सकती है। यह हमारे मन के ऊपर होता है कि हमें किन लोगों के साथ रहना है और इसका पाठ हमें अनुशासन से मिलता है। अगर हम अपने हर कार्य एक नियम और कायदे के साथ करेंगे, तब हमें अच्छी संगत का ज्ञान होगा। अक्सर हमारी युवा अवस्था में ही इनका ज्यादा असर देखने को मिलता है। यही अवस्था होती है, जब हमें बहुत-से लोगों का साथ मिलता है और जरूरी नहीं कि वे सारे ही लोग सद्भाव से भरे होंगे। इसलिए यही अवस्था होती है जब हमें अपने विवेक पर भरोसा करना होता है।
’एकता, फरीदाबाद, हरियाणा

Next Stories
1 खतरे में बचपन
2 समस्या की जड़
3 प्रकृति के स्तंभ
ये पढ़ा क्या?
X