शोषण का दुश्चक्र

कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के मद्देनजर जिस तरह से कई राज्यों ने आंशिक पूर्णबंदी और रात के कर्फ्यू जैसे कदम उठाए हैं।

Coronavirus, COVID-19 Lockdownभारत में कोरोनावायरस की बढ़ती रफ्तार के बीच सरकार ने वैक्सीनेशन की गति भी तेज कर दी है। (फोटो- पीटीआई)

कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के मद्देनजर जिस तरह से कई राज्यों ने आंशिक पूर्णबंदी और रात के कर्फ्यू जैसे कदम उठाए हैं। कुछ हद तक ये उपाय कारगर भी हो सकते हैं। वेकिन मास्क न लगाने, सुरक्षित दूरी का पालन न करने के नाम पर जिस तरह से चालान काट कर सरकारी खजाना भरने का रास्ता निकाल लिया गया है उससे तो लगता है कि सरकार का मकसद न केवल तानाशाही दिखाना है, बल्कि वस्तु स्थिति के अनुरूप चिकित्सा व्यवस्था करवाने की जिम्मेदारियों से भी मुक्त होना है।

देश के जिस हिस्से में सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक संगठनों द्वारा विशाल सभाएं की जा रही है, वहां पर कोरोना विस्तार के आंकड़े सुप्त अवस्था में चले जाते हैं। ऐसा लगता है कि कोरोना का खतरा जितना है, उससे कहीं ज्यादा जोर तो सरकार द्वारा जुमार्ना लगाने, विज्ञापन जारी करने और हवाबाजी से डराने में ज्यादा किया जा रहा है। सरकार निशुल्क मास्क क्यों नहीं बांट रही है? क्या दंडित करना ही उद्देश्य रह गया है सरकार का?
’युगल किशोर शर्मा, खांबी ( फरीदाबाद)

फिर पलायन का संकट

पिछले वर्ष के इसी महीने में हुई वे दर्दनाक घटनाएं फिर से याद आने लगी हैं जब पूर्णबंदी और नियोक्ताओं द्वारा अपने कर्मियों को नौकरी में नहीं रखने की जिÞद के कारण लाखों अप्रवासी मजदूरों को अपने घर का रुख करना पड़ा था और रास्ते में उन्हें तमाम तरह की यातनाएं झेलनी पड़ीं। अभी भी कोरोना की दूसरी लहर के चलते मजदूरों में एक डर बैठा हुआ है कि कहीं आने-जाने की पाबंदी और रात का कर्फ्यू फिर कहीं वैसी ही स्थिति तो पैदा नहीं कर देंगे।

हालांकि देश के कुछ राज्यों से एक बार फिर मजदूर और कामगार घरों को लौटने की खबरें आने लगी हैं। सरकारी पाबंदियों से ऐसा लगने लगा है कि अब हमें तैयार रहते की जरूरत है ताकि अगर कुछ ऐसा हो तो हड़बड़ी में कोई निर्णय लेने की जरूरत नहीं पड़े। कोरोना महामारी में सबसे ज्यादा दिहाड़ी मजदूरों का नुकसान हुआ है। इस कारण उनका डरना स्वाभाविक है। इसलिए सरकार से भी अपेक्षा की जाती है कि पूर्णबंदी की स्थिति में इन मजदूरों के खानपान के साथ ही साथ रोजगार के अवसर दिलाने की भी व्यवस्था हो।
’अशोक, पटना (बिहार)

अंधविश्वास की जड़ें

इक्कीसवीं सदी में भी भारत की अधिकांश आबादी अंधविश्वास में जकड़ी हुई है। शहरों से अधिक गांवों में इसकी जड़ें गहरी हैं। चाहे पढ़े-लिखें हो या अनपढ़, अंधविश्वास से मुक्ति कोई नहीं पा सका है। कुत्ता कान फड़फड़ाए तो उसे अपशकुन समझ लेते है, बिल्ली रास्ता काट जाए तो यात्रा स्थगित कर देते हैं, कोई छींक दे तो लोग ठहर कर आगे बढ़ते हैं। न जाने ऐसी कितनी ही बाते हैं जो अंधविश्वास के कारण बनते हुए काम बिगाड़ देती है। भूत-प्रेतों के नाम पर स्थित और भी अधिक बुरी है।

अधिकतर देखने में आता है कि मनुष्य अपनी इच्छाओं का दास बन गया है और उनकी पूर्ति के लिए टोने-टोटके में उलझ कर समय, श्रम और धन का अपव्यय करने लगा है। वह अपने विवेक को भूल कर गलत रास्ते की ओर कदम बढ़ा रहा है। यह समाज के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। अंधविश्वास को हम केवल शिक्षा, जागरूकता और विवेक से मिटा सकते हैं। और इसके लिए प्राथमिक शिक्षा से ही पहल करने की जरूरत है। समाज के जागरूक तबके को भी इसमें भूमिका निभानी होगी।
’कांतिलाल मांडोत, सूरत

कोरोना और चुनाव

पिछले साल से ही देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है। अब तो दूसरी लहर में रोजाना सवा लाख से ज्यादा संक्रमित आ रहे हैं। लेकिन एक आश्चर्य का विषय है कि जिन राज्यों में विधानसभा का चुनाव है, उन राज्यों से संक्रमितों की संख्या में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही। इससे तो लगता है कि महामारी भी सरकार के इशारे पर ही चल रही है।

गत वर्ष बिहार विधानसभा के दौरान भी बिहार से महामारी की रिपोर्टें सामान्य आने लगी थीं। चुनाव प्रचार के दौरान शारिरिक दूरी और मास्क का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन हुआ, फिर भी संक्रमितों की संख्या में इजाफा नहीं हुआ। अभी देश में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव रैलियों में जिस तरह से भीड़ उमड़ती दिख रही है, वह चिंताजनक है। बड़े नेताओं और उनके समर्थक कोरोना के दिशा-निदेर्शों की धज्जियां उड़ाने में कोई संकोच नहीं कर रहे।
’हिमांशु शेखर, केसपा, गया

असमानता का सवाल

विश्व आर्थिक मंच की इस साल की लैंगिक असमानता रिपोर्ट में बताती है कि एक सौ छप्पन देशों वाले इस सूचकांक में भारत अब एक सौ चीलीसवें स्थान पर खिसक गया है। राजनीति में लैंगिक असमानता समस्त विश्व में है। इसमें बारत की स्थिति और दयनीय होती जा रही है। भारत की संसद में सिर्फ छब्बीस फीसद महिलाएं ही हैं, वहीं बाईस फीसद महिलाएं ही मंत्री हैं। अक्सर सुनने और पढ़ने में आता है कि लैंगिक भेदभाव के कारण महिलाओं को कई तरह की प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ता है।

स्वीडन सहित कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और मेक्सिको जैसे देश महिलाओं से जुड़ी नीतियों पर ठोस काम करते हुए बढ़ रहे हैं। हालांकि भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र में लैंगिक समानता पर जोर दिया है। गौरतलब है कि यह बात स्वयं भारत पर भी लागू होती है।
भारत में महिलाओं के योगदान से न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी होगी, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी समानता आएगी। हाल में राष्ट्रीय राजधानी में महिलाओं की बेरोजगारी से जुड़ी एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें महिलाओं में बढ़ी बेरोजगारी की दुर्दशा को भलीभांति बताया गया था।
’अमन जायसवाल, दिल्ली विवि, दिल्ली

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