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नरेंद्र मोदी पर कैसे हो भरोसा…

भरोसा जब डगमगाता है तो वांछित हाथ से फिसलने लग जाता है। नरेंद्र मोदी के साथ यही हो रहा है। उन्होंने लोकसभा चुनाव जीतने के लिए जो वादे किए थे, डेढ़ साल बाद उनमें से कुछ भी पूरे नहीं होने के आसार के बीच जनता को अब उनकी कही बात थोथी नजर आती है।

Author August 20, 2015 9:11 AM
भरोसा जब डगमगाता है तो वांछित हाथ से फिसलने लग जाता है। नरेंद्र मोदी के साथ यही हो रहा है।

भरोसा जब डगमगाता है तो वांछित हाथ से फिसलने लग जाता है। नरेंद्र मोदी के साथ यही हो रहा है। उन्होंने लोकसभा चुनाव जीतने के लिए जो वादे किए थे, डेढ़ साल बाद उनमें से कुछ भी पूरे नहीं होने के आसार के बीच जनता को अब उनकी कही बात थोथी नजर आती है।

15 अगस्त को आजादी की 69वीं वर्षगांठ पर उन्होंने डेढ़ घंटे का भाषण देकर सबसे लंबा भाषण देने वालों में भले अपना नाम लिखा लिया हो पर वह संबोधन पुरानी बातों के दोहराव और अपनी सरकार के प्रति डिगते भरोसे को संभालने की कसरत पर ही केंद्रित था। जिस तरह यह कहा जाता है कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच बन जाता है, उसी तरह यह भी अनुभव किया गया है कि किसी बात को चाहे जितना जोर लगाकर बार-बार कहा जाए पर जब वह कथनी करनी में नहीं बदलती तो ‘गप’ में तब्दील हो जाती है।

लालकिले से भाषण में नरेंद्र मोदी ने सांप्रदायिकता के बाबत कहा कि यह तो विकास के चक्र में अपने-आप गुम हो जाएगी। विकास और भरोसे पर वे चाहे जितनी मुंहजोरी करें, वह देशवासियों के गले नहीं उतर रही है। उन्होंने भाषण में बाईस बार ‘विश्वास’ और कई बार ‘संकल्प लेता हूं’ का जिक्र किया। लेकिन देशवासियों का भरोसा खोने से बेचैन मोदी एक दिन बाद ही पहुंच गए दुबई और अपने कॉरपोरेट इवेंट मैनेजमेंट की पुरानी शैली में दौरे का प्रचार कराया।

विकास और भरोसे दोनों को जोड़ते हुए अबूधाबी में मंदिर के लिए जगह और ‘समझने वालों के लिए इशारा ही काफी होता है’ की बात कह कर आतंकवाद के खिलाफ अमीरात के साथ होने की बात कह पाकिस्तान की ओर इशारा करने की कसरत भी पहले की तरह ‘मुंहजोरी’ से ज्यादा कुछ नजर नहीं आई। दुबई से 4.5 लाख करोड़ की संभावित निवेश राशि की मात्रा कितनी बड़ी है, इसे उन्होंने दोनों हाथ फैलाकर ही नहीं बताया बल्कि यह भी जोड़ा कि इतनी बड़ी राशि कोई यों ही निवेश थोड़े ही कर देता है, यह मेरी सरकार पर भरोसे के चलते हुआ है, जो पहले नहीं बना था। ऐसे निवेश संबंधी भाषण उनकी हर यात्रा का हिस्सा रहे हैं।

जो भरोसा वे लालकिले से नहीं जमा पा रहे थे, वह दुबई जाकर जमाने की कोशिश बेमानी है। वे दुबई की मस्जिद में जाकर और अपनी सभा में मुसलिम समुदाय के प्रवासी भारतीयों पर कैमरे फोकस करा कर मुसलिमप्रेमी और अमीरात के बादशाह से मंदिर के लिए जमीन की हामी भरवाने को ‘बड़ी बात’ ठहरा कर हिंदूहितैषी होने का प्रमाणपत्र लेने की कसरत भी कर रहे थे। यहां भी उन्होंने 34 साल बाद किसी प्रधानमंत्री के आने का राग ही नहीं गाया, बल्कि बार-बार अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने से भी नहीं चूके। यह सारी कसरत बिहार चुनाव को ध्यान में रख हो रही है!

रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

 

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