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चौपालः गंगा की खातिर

गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए एक सौ तेरह दिन तक अनशन करने के बाद आखिरकार स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

Author October 17, 2018 2:54 AM
स्वामी सानंद से सात साल पहले गंगा के लिए एक सौ चौदह दिन तक अनशन करने के बाद स्वामी निगमानंद ने भी अपनी देह त्यागी थी।

गंगा की खातिर

गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए एक सौ तेरह दिन तक अनशन करने के बाद आखिरकार स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद ने दुनिया को अलविदा कह दिया। इतने दिनों में किसी ने उनकी सुध नहीं ली, यह बहुत अफसोसनाक है। आइआइटी के प्रोफेसर रहे जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद अपना सब कुछ छोड़ कर गंगा के लिए समर्पित हो गए थे। जो व्यक्ति इतने दिनों तक अनशन पर रहा उससे मिलने के लिए उस तंत्र से कोई नहीं गया जो हजारों करोड़ रुपए गंगा को निर्मल बनाने के लिए बर्बाद कर देता है। बहुत से ऐसे लोग हैं जो अखबारों और टीवी चैनलों पर यह तो कहते मिल जाएंगे कि हम गंगा को अविरल और निर्मल बनाएंगे लेकिन करते कुछ नहीं हैं। किसी ने भी स्वामी सानंद का अनशन तुड़वाने की कोशिश नहीं की और न यह दिलासा दिलाया कि आप अनशन खत्म करिए, गंगा के लिए कुछ न कुछ जरूर किया जाएगा। स्वामी सानंद गंगा पर बनने वाले बांधों के बिलकुल खिलाफ थे। वे अनशन पर बैठे ही इसलिए थे कि हिमालय में होने वाले अवध खनन को रोका जाए और गंगा पर बनने वाले बांधों पर रोक लगाई जाए। लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी।

स्वामी सानंद का कहना था कि अगर नदियों पर इसी प्रकार बांध बनते रहे तो वे अपना असली स्वरूप खो देंगी और मनुष्य के अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न हो जाएगा। हिमालय में होने वाले खनन से पहाड़ों का खिसकना जारी रहेगा जिसका खमियाजा हम केदारनाथ त्रासदी या लगातार बढ़ते भूस्खलनों के रूप में भुगत रहे हैं। पहाड़ आगे इससे भी ज्यादा उग्र रूप धारण कर सकते हैं। लेकिन मनुष्य अपने स्वार्थों की रौ में पर्यावरण के प्रति सचेत नहीं है, बल्कि उसे बर्बाद करने पर तुला हुआ है। आज बेमौसम बरसात और तूफान आना आम हो गया है। मनुष्य अपने भोग विलास के लिए नदियों और पेड़ों के साथ पहाड़ों को भी नष्ट कर रहा है। गंगा तो इतनी दूषित हो चुकी है कि उसका पानी पीने लायक भी नहीं रहा है। जिस नदी की सफाई पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हों वह आज गंदे पानी की नदी हो चुकी है।

स्वामी सानंद से सात साल पहले गंगा के लिए एक सौ चौदह दिन तक अनशन करने के बाद स्वामी निगमानंद ने भी अपनी देह त्यागी थी। आखिर कब तक हमारे संत-महात्मा गंगा को निर्मल और अरविल बनाने के लिए अपनी देह का त्याग करते रहेंगे? हम सब सोचते रहते हैं कि अनशन करने से ऐसा कुछ नहीं होने वाला क्योंकि हम अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए गंगा को गंदगी की वाहक बनाते रहते हैं। दरअसल, हम खुद नहीं चाहते कि गंगा को निर्मल बनाया जाए।

जयदेव राठी, भराण, रोहतक, हरियाणा

सबक का समय

सात साल की बच्ची से 14-15 साल के नाबालिगों द्वारा दुष्कर्म की घटना झकझोर देने वाली है। बड़े तो बड़े, छोटे भी ऐसे शर्मनाक अपराध करने से नहीं चूक रहे हैं। यह समाज के उत्तरोत्तर नैतिक पतन का संकेत है। अब इन घटनाओं से सबक लेने का समय है। अनेक शोधों में चिंता जताई गई है कि मोबाइल फोन के कारण बच्चों में कई दुष्प्रवृत्तियां पनप रही हैं। मोबाइल उनके कोमल मन और अपरिपक्व मस्तिष्क को प्रभावित कर ‘क्या भला, क्या बुुरा है’ का विवेक और सोचने-समझने की क्षमता को अवरुद्ध कर देता है। यही कारण है कि बच्चे सही राह से भटक कर पतन की अंधेरी गलियों मेें चले जाते हैं। माता-पिता बच्चों को मोबाइल देने की बजाय उन्हें भले-बुरे का भेद बताते हुए संस्कार व नैतिकता की शिक्षा देने पर ध्यान दें। बच्चोंं को हर हाल में मोबाइल से दूर रखा जाना चाहिए वरना बाद में पछताने के सिवाय कोई चारा नहीं रहेगा।

हेमा हरि उपाध्याय, जावरा रोड, उज्जैन

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