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गर्म सलाखें

दलबदल वे गर्म सलाखें हैं, जो हमारे देश के लोकतंत्र को हर समय दागती रहती हैं।

दलबदल वे गर्म सलाखें हैं, जो हमारे देश के लोकतंत्र को हर समय दागती रहती हैं। उसके शरीर और आत्मा को हर पल घायल करती रहती हैं। दलीय लोकतंत्र ने दलबदल कानून तो बनाया, पर उसके दलदल में गुंजाइश की इतनी गलियां हैं कि वह कानून के बजाय मखौल बन कर रह गया। चुनाव पूर्व दलबदल की लहर चल पड़ती है। बरसों तक सत्ता की मलाई चाटने के बाद नेताओं को अपनी उपेक्षा महसूस होती है और वे अपने वर्ग की भलाई के बहाने मलाई की अपेक्षा में दूसरे दल में बेशर्मी से शरीक हो जाते हैं। इन लोगों ने राजनीति को गिरगिट के रंग में रंग दिया है।

सभी नेता दलबदल खेल के बेहतर खिलाड़ी हैं, अत: इनसे कठोर कानून और नैतिकता की आशा नहीं की जा सकती। इसलिए जो मतदाता इनके बार-बार दल बदलने पर भी अंधभक्त होकर उन्हें चुनाव जिता कर पुरस्कृत करता रहता है, उसे ही उन्हें हरा कर तिरस्कृत करना पड़ेगा, तभी दलबदल का राजरोग मिट सकेगा।
सुरेश माहेश्वरी शिवम्, बड़नगर, उज्जैन

विचारधारा के बगैर

पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर नेताओं द्वारा पाला बदलने का जो खेल खेला जा रहा है, उसका सहारा एक अरसे से सभी दल ले रहे हैं। विचारधारा और विकास की राजनीति पर भरोसा इन दलों का नहीं रहा। वे ज्यादा जोर सामाजिक समीकरणों को साधने पर दे रहे हैं। मतदाता इस संस्कृति के ऐसे आदी बना दिए गए हैं कि वे भी इन खेलों को सहज तरीके से लेने लगे हैं। हालांकि ऐसी राजनीति के कुप्रभाव का असर अंतत: मतदाता ही भुगतता है।

उन्नीस सौ नब्बे के बाद जिस सामाजिक समूहों की शीर्ष स्तर पर सत्ता में साझेदारी सुनिश्चित होनी चाहिए थी, वे चंद समूहों में सिमट गए हैं। इसके चलते वे समूह और उनके नेता यथोचित स्थान पाने को व्यग्र रहे। बिहार की राजनीति के कुशल योद्धा नीतीश कुमार ने इस बेचैनी को भलीभांति समझा और अन्य पिछड़े वर्ग में अति पिछड़ों का समूह बना कर सत्ता और प्रशासन में यथोचित स्थान दिलाया। इसका फल है कि सभी बड़े-छोटे दल नीतीश की अगुवाई स्वीकार करने को बाध्य हैं।

भाजपा के पास उत्तर प्रदेश की सियासत में यह मौका दो हजार सत्रह में आया था। पर शीर्ष नेतृत्व इस संबंध में कोई उचित निर्णय नहीं ले सका। नतीजा यह हुआ कि जो कुछेक बड़े नेताओं ने पांच साल पहले पार्टी का दामन पकड़ा था, अब चुनाव से ऐन पहले दामन झटक दिया। जाहिर है, उनके इस निर्णय में उनका अपना और परिवार का हित भी निहित है। चुनाव लोकतंत्र का महत्त्वपूर्ण समय है। चुनावी माहौल से जाहिर हो जाता है कि आने वाली सरकार कैसी मिलेगी?

मुकेश कुमार मनन, पटना

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