scorecardresearch

उम्मीद और इंतजार

चुनाव का समय होता है तो हमें सपने दिखाए जाने लगते हैं कि हमारे अच्छे दिन आने वाले हैं।

उम्मीद और इंतजार
सांकेतिक फोटो।

ऐसे वादे किए जाते हैं, जिससे लगने लगता है कि अगर इस पार्टी की सरकार बनी तो हमारे सारे दुख, तकलीफ दूर हो जाएंगे। यही विश्वास की डोरी पकड़े हुए हम उम्मीदवार को वोट देते हैं। पर सत्ता में आते ही वे अपने किए हुए वादों को कुचल कर आगे बढ़ जाते हैं और हमारे विश्वास की डोरी कट जाती है।

यों इसकी जद में सभी आते हैं, मगर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं किसी नौकरी के अभ्यर्थी। वे इसी उम्मीद से वोट देते हैं कि उन्हें रोजी-रोजगार दिलाने का जो काम पुरानी सरकार नहीं कर पाई वह नई सरकार करेगी, पर उसकी उम्मीद बस उम्मीद बनकर रह जाती है। चुनाव से पहले बोला जाता है कि लाखों की संख्या में विभिन्न पदों पर भर्ती की जाएगी, पर यह हो नहीं पाता है।

कई-कई भर्तियां तो सालों तक अटकी पड़ी रहती हैं। यह केवल केंद्र में भर्ती प्रक्रिया की बात नहीं है, यह समस्या राज्य की भी भर्ती प्रक्रिया की है। आए दिन विद्यार्थी और अभ्यर्थी धरना-प्रदर्शन करते हैं, अपने मांगों को रखते हैं, पर सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंगती है। कई बार सरकार तो जैसे भर्ती निकाल कर भूल जाती है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड जैसे राज्यों में कई सालों से भर्तियां लटकी पड़ी हैं, पर उस ओर किसी का ध्यान नहीं है।

सवाल है कि क्या इसमें विद्यार्थी की कोई गलती है? उसका काम है मन लगाकर पढ़ना और परीक्षा देना और उत्तीर्ण करना, पर सरकार की गलत नीतियां विद्यार्थियों को कमजोर कर देती हैं। कोई विद्यार्थी अगर पूरी मेहनत से किसी विज्ञापन को मद्देनजर रखते हुए उसकी तैयारी करता है और जब वही भर्ती पांच-छह वर्ष से अटकी पड़ी होती है, तो उनके मनोबल पर चोट पहुंचती है और पढ़ाई के प्रति उनकी रुचि धीरे-धीरे घटने लगती है।

साथ ही भर्ती प्रक्रिया में बैठने की उम्र सीमा भी उनके लिए समस्या होती जाती है। इन्हीं सब कारणों की वजह से भी आत्महत्या की दर बढ़ती जा रही है।सरकार हर चीज पर बात करती है, पर बेरोजगारी पर बात करना उसके लिए जरूरी नहीं लगता। हर बार नई सरकार बनती है और अगर नौकरी का विज्ञापन प्रकाशित हो जाता है तो उसे पूरा होने में अगले चुनाव का इंतजार करना होता है। बेरोजगारी का ढाल बना कर नेता वोट तो ले लेते हैं, पर बेरोजगारी मिटती नहीं है और न ही उसके बारे में कोई चर्चा होती है।
शैलेश कुमार, मधुपुर

वायुमंडल से जीवन

युद्ध जैसे माहौल से बचना चाहिए। युद्ध से पर्यावरण को नुकसान होता है। वायुमंडल विषाक्त होता है। फिलहाल जिस गति से पृथ्वी का वायुमंडल के छीजने की खबरें आ रही हैं, उस हिसाब से अगर आने वाले वक्त में वायुमंडल जीवन लायक नहीं रहे तो यह हैरानी की बात नहीं होगी। इसलिए वायुमंडल को विषाक्त होने से बचाना चाहिए, ताकि ओजोन परत सुरक्षित बनी रह सके।

धरती या किसी ग्रह का वायुमंडल उस ग्रह के गुरुत्वाकर्षण के कारण बंधा रहता है। इस बंधे हुए वायुमंडल के बाहर अंतरिक्ष में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं, जिसके कारण वायुमंडल की कुछ वायु गुरुत्वाकर्षण को तोड़कर अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है। इस प्रक्रिया को ‘ओरेरा’ कहा जाता है। पृथ्वी के रहवासियों को कार्बन उत्सर्जन की मात्रा को कम करना होगा। वृक्षारोपण को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि वायुमंडल सुरक्षित बना रहे। वृक्ष भी आक्सीजन प्रदान करते हैं। वायुमंडल से ही धरती के रहवासी सुरक्षित रह सकते हैं।
संजय वर्मा ‘दृष्टि’, धार

पढें चौपाल (Chopal News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.

First published on: 03-10-2022 at 07:17:43 am
अपडेट