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इतिहास बनाम राजनीति

प्रधानमंत्री ने इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की होलोग्राम प्रतिमा का अनावरण करते हुए कहा कि देश अपनी गलतियों को ठीक कर रहा है।

India Gate

प्रधानमंत्री ने इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की होलोग्राम प्रतिमा का अनावरण करते हुए कहा कि देश अपनी गलतियों को ठीक कर रहा है। उनका यह कथन बहुत हद तक सही भी है। क्योंकि हममें से कितने लोगों को शहीद भगत सिंह की पूरे जीवन की जानकारी है या किसी से पूछ कर देखिए कि शहीद भगत सिंह के साथ फांसी पर चढ़ने वाले राजगुरु और सुखदेव का पूरा नाम क्या है? विरला ही जनता होगा कि उनका पूरा नाम शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर था। ऐसे कितने ही स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं, जिनके नाम तक, हमारी वर्तमान पीढ़ियां नही जानती हैं। हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को देश के सामने ठीक ढंग से प्रस्तुत ही नहीं किया गया। यह क्या उन शहीदों के साथ भेदभाव नहीं है।

उपनिवेश काल के दौरान बनाए गए स्मारक और स्मृति स्थल इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, पर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक हमारे देश के गौरव का प्रतीक है। ऐसे विषयों पर राजनीति नही की जानी चाहिए। सरकार को उन शहीदों के बारे में भी विचार करना चाहिए, जिनको आज तक वह सम्मान और स्थान नहीं मिल पाया, जो उनको मिलना चाहिए था।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस, शहीद चंद्रशेखर आजाद, शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि ऐसे शहीदों को भी वही सम्मान और आदर मिले, जो आज हम स्वंतंत्रता आंदोलन के अन्य शहीदों को देते हैं। इतिहास की त्रुटियों को भी ठीक करने का समय आ गया है। अगर हम अपने इतिहास को भी ठीक कर लें तो शायद हमारी आने वाली पीढ़ियों को सही जानकारी मिल सके। शहीदों के प्रति यही हमारी असली श्रद्धांजलि होगी।

  • राजेंद्र कुमार शर्मा, रेवाड़ी, हरियाणा

बेरोजगारों की व्यथा

भारत में बेरोजगारी सुरसा की तरह मुंह फैलाए नौजवानों के सपनों को निगलती जा रही है। देश के युवक विशेष रूप से जो योग्यता के मामले में औसत हैं, वे किसी भी स्तर पर रोजगार चाहतें हैं। उनको लगता है कि जो भी मिलेगा, अच्छा ही होगा। चाहे रोजगार घर से दूर मिले, दूसरे राज्य में मिले, अस्थाई कर्मचारी के रूप में मिले या फिर कम वेतन पर, उसे सब मंजूर है।

लेकिन अब देखने में आ रहा है कि सरकार बेरोजगारों को नौकरी देने के बजाय सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारियों की सेवा फिर से लेने के लिए आवेदन मांगती है। पहले तो हर सेवानिवृत्त कर्मचारी इस तरह की नियुक्ति के लिए लालायित रहते थे, किंतु सरकार ने अब नीति बना ली है कि कर्मचारी जिस पद से सेवानिवृत्त हुआ है, उससे एक पद नीचे ही नियुक्ति प्राप्त कर सकता है। सवाल है कि जब सेवानिवृत्त लोगों को रखा जाता रहेगा तो बेरोजगारों के लिए रास्ता कैसे बनेगा?

सरकार को कोई ऐसी ठोस नीति बनानी चाहिए जिससे नवयुवकों के सपनों पर कुठाराघात न हो। सर्वविदित है कि किसी राज्य में कई वर्षों में कोई एक-आध विभाग में भर्ती निकलती है और वह भी किसी अदालती मामले में उलझ कर रह जाती है, या फिर भर्ती परीक्षाएं धांधलेबाजी की शिकार हो जाती हैं। ये चीजें नौजवानों को हताश ही करती हैं।

  • उमेश प्रताप वत्स, यमुनानगर

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