scorecardresearch

विश्व की हिंदी

‘पर हित सरिस धर्म नहिं भाई / पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।’ यानी दूसरों के हित करने के समान कोई धर्म नहीं है एवं दूसरों को दुख पहुंचाने के समान कोई नीचता नहीं।

सांकेतिक फोटो।

‘पर हित सरिस धर्म नहिं भाई / पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।’ यानी दूसरों के हित करने के समान कोई धर्म नहीं है एवं दूसरों को दुख पहुंचाने के समान कोई नीचता नहीं। हिंदी साहित्य में लोक मंगल की भावना, विश्व बंधुता एवं मानवतावाद वह कड़ी है जो विश्व को एक सूत्र में बांधने के लिए प्रेरित करता है। दरअसल, भाषा के विकास के साथ उस भाषा के साहित्य का भी समग्र विकास होता है।

हम भारतीय जहां-जहां गए, अपने साथ हिंदी भाषा और छिटपुट हिंदी साहित्य की विधा को भी ले गए। हमारे समझ से गीत विधा का भी खासा प्रभाव रहा, जिसे गुनगुनाते विदेशियों ने भी कंठस्थ कर लिया।‘कबीरवाणी’ और तुलसी बाबा कृत ‘रामचरितमानस’ के दोहे गरीब और अनपढ़ मजदूरों का कंठहार बना, जिसके फलस्वरूप साहित्य का प्रसार हुआ। आज मारिशस और खाड़ी देशों में बसे हुए भारतवंशी जो गिरमिटिया कहे जाते हैं, उनके द्वारा रचे भारतीय प्रवासी साहित्य हमें जोड़ता है। देवकीनंदन खत्री का ‘चंद्रकांता’ पढ़ने के लिए बहुत सारे अहिंदी भाषियों ने हिंदी सीखी थी। हिंदी साहित्य से अपने विभिन्न विमर्श यानी दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि सामाजिक विमर्श विभिन्न देशों के समाज द्वारा स्वीकार किया जा रहा है।

रूस और भारत के बीच सांस्कृतिक एकरूपता ने रूस में भारतीय हिंदी सिनेमा के माध्यम से हिंदी साहित्य का झंडा गाड़ दिया। ‘तीसरी कसम’ पर बनाई गई फिल्म को रूस में ही जाकर भारी सफलता मिली। राजकपूर का ‘आवारा’ रूस में रिलीज हुई थी, तब फिल्म का गाना ‘मेरा जूता है जापानी’ वहां पर काफी प्रसिद्ध हुआ। गाना रूसियों को इतना बढ़िया लगा कि बच्चे, बड़े और बूढ़े के साथ सरकारी लोगों की जुबान पर चढ़ गया।

व्यक्ति कहीं भी जाए, वह अपनी संस्कृति, भाषा और साहित्य को बचाए रखने के लिए भरसक प्रयास करता है। कनाडा में रहने वाले भारतीय मूल के लोग अपने घर के ही मंदिर बनवाएं। यह धार्मिक केंद्र सांस्कृतिक केंद्र में तब्दील हो गया, जहां भारतीय नृत्य सिखाया जाने लगा। हिंदी की पढ़ाई करवाई जाने लगी। उसका प्रतिफल यह निकला कि विश्व हिंदी संस्था (कनाडा) नामक साहित्य मंच हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार के माध्यम से वैश्विक एकीकरण का अक्षय बना रहा है।

कई हिंदी पत्रिकाएं यहां से संपादित हो रही है। बौद्ध साहित्य पाली भाषा में लिखा गया था, जो उस समय की मगध और मध्यदेश की जनभाषा थी। इसकी लिपि हिंदी भाषा से मिलती-जुलती है। आखिरकार धड़ल्ले से हिंदी में अनुवाद हुआ। बौद्ध उपदेश से प्रभावित लोग हिंदी समझने-बुझने यहां पहुंचते हैं।

मैं जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय से एमए कर रहा था, वहीं हिंदी से डिप्लोमा कर रही एक जापानी युवती से वातार्लाप के क्रम में पता चला कि वह निराला से बहुत प्रभावित थी। यह दर्शाता है कि हिंदी साहित्य के प्रति विदेशी सरजमीं पर रहने वालों के बीच विशेष ललक है। हिंदी का लोकवृत (फांचस्का आसेर्नी) द्वारा लिखा गया है, जिसमें राष्ट्रवाद के युग में भाषा और साहित्य पर प्रकाश डाला गया है।

इसका काल सन 1920 से सन 1940 रहा। जार्ज ग्रियर्सन एवं फादर कामिल बुल्के जैसे विदेशी विद्वान ने हिंदी साहित्य पर अद्भुत कार्य किया है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। हिंदी साहित्य के अंदर कई छोटी-छोटी संस्कृतियां विद्यमान हैं, जिसके विकास में हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य का भरपूर सहयोग रहा है। कई संस्कृतियों के समावेशी शक्ति से हृष्ट-पुष्ट बना हिंदी साहित्य वैश्विक एकीकरण में मील का पत्थर साबित हो रहा है।

  • कुमार मंगलम रणवीर, पाटलिपुत्र विवि, पटना

पढें चौपाल (Chopal News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.

अपडेट