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चौपालः हमारी भाषा

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है’। इंदौर में 1918 में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन में उन्होंने हिंदी का समर्थन करते हुए ऐलान किया था कि हिंदी ही हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी ही चाहिए।

Author September 17, 2018 5:21 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

हमारी भाषा

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है’। इंदौर में 1918 में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन में उन्होंने हिंदी का समर्थन करते हुए ऐलान किया था कि हिंदी ही हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी ही चाहिए। आज हिंदी को कमतर समझने वाले किसी भी भारतीय को नहीं भूलना चाहिए कि वह हिंदी ही थी जिसने आजादी से पहले बिखरे और विषमताओं से भरे हुए संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र में बांधा था। यह भाषागत एकता का ही चमत्कार था कि देश के सभी क्षेत्रों के स्वतंत्रता सेनानियों, राष्ट्रनेताओं और आमजन में सीधा संवाद और संचार स्थापित हो सका था जिसके कारण स्वतंत्रता से पहले ही संपूर्ण भारत के लोगों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया था। नतीजतन, राष्ट्रभाषा के प्रचार के साथ राष्ट्रीयता के प्रबल हो जाने पर अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा और सदियों से गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत को स्वतंत्रता की शीतल छांव नसीब हो पाई थी।

कैसी विडंबना है कि स्वतंत्रता के पूर्व जो छोटे-बड़े राष्ट्रनेता राष्ट्रभाषा या राजभाषा के रूप में हिंदी को अपनाने के मुद्दे पर सहमत थे, उनमें से ज्यादातर गैर-हिंदी भाषी नेता स्वतंत्रता मिलने के वक्त हिंदी के नाम पर बिदकने लगे। लेकिन हिंदी को विशाल जनसमर्थन प्राप्त था इसलिए काफी अड़चनों के बावजूद आखिरकार उसे 14 सितंबर 1949 को संवैधानिक रूप से राजभाषा घोषित कर दिया गया। लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि हिंदी देश की राजभाषा है न कि राष्ट्रभाषा। संविधान के अनुच्छेद 351 में संघ सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि वह राजभाषा हिंदी का प्रसार बढ़ाए, उसका निरंतर विकास करे मगर हमारे नीति निर्धारकों और जनप्रतिनिधियों ने हिंदी के बजाय अंग्रेजी को ही अधिक तवज्जो दी जो आज तक जारी है। न्याय, विधि और कानून की भाषा तो सिर्फ अंग्रेजी है। हकीकत यही है कि हिंदी नाममात्र की राजभाषा बनकर रह गई है और राजभाषा के सारे अधिकारों पर अंग्रेजी ने अतिक्रमण कर लिया है।

सवाल है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जो हिंदी देश में राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनी और उस राष्ट्रीय चेतना के बूते ही देश स्वतंत्र हो सका, वह अपने ही घर में उपेक्षणीय क्यों है? आज हिंदी अपने मान-सम्मान और गरिमा की लड़ाई लड़ रही है, देश को स्वतंत्र कराने वाली जनभाषा खुद परतंत्र हुई जा रही है। क्या कभी राजभाषा हिंदी को अपने सभी अधिकार मिल पाएंगे? हर साल हिंदी पखवाड़ा या हिंदी दिवस मनाने का औचित्य तभी होगा जब हम हिंदी को उसका वास्तविक स्थान दिला सकें।

अंकित रजक, बिल्हारी-दतिया, मध्यप्रदेश

विश्वास का संकट

आज हमारे देश व समाज में जो भयावह स्थिति निर्मित हो रही है वह है विश्वास का संकट। अपना हो या पराया, किस पर विश्वास करें किस पर नहीं, समझ नहीं आता। पग-पग पर दया, करुणा, सहयोग, विश्वास वाले देश में अब हर कोई एक-दूसरे को शक की नजरों से देख रहा है। विश्वास के नाम पर विश्वासघात विश्वसनीयता को धीरे-धीरे खोटे सिक्के की तरह हाशिये पर धकेल कर चलन से बाहर कर रहा है। घरों में बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं, बाहर जाओ तो लूटने-खसोटने वाले दरिंदे तैयार बैठे हैं। जहां देखो वहां, जिसे देखो वह विश्वास के नाम पर छल, कपट, धोखा कर रहा है। विश्वास भारतीय संस्कार, संस्कृति, सभ्यता की जड़ है, जिस पर खुशहाली के फल लगते हैं। हम सब धन, वैभव, भौतिकता, विलासिता की इस चकाचौंध में अपनी कथनी के विपरीत आचरण कर विश्वास को कब्र में दफनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

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