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चौपालः तंत्र में हिंदी

भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है और प्रतिवर्ष हिंदी दिवस भी मनाया जाता है। पर क्या सिर्फ हिंदी दिवस को मनाने या संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने से उसको वह सम्मान प्राप्त हो सकता है, जिसकी वह अधिकारी है?

भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है और प्रतिवर्ष हिंदी दिवस भी मनाया जाता है।

भारत की सबसे प्रतिष्ठित और प्रतिवर्ष योग्यतम प्रशासनिक अधिकारियों का चयन करने वाली संस्था यूपीएससी यानी संघ लोग सेवा आयोग के बदले परीक्षा पाठ्यक्रम से प्रतिवर्ष हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों का चयन अंग्रेजी माध्यम के अभ्यर्थियों की अपेक्षा बहुत कम होता है। इससे हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों का चयन ग्राफ लगातार प्रतिवर्ष तेजी से घटता जा रहा है। अधिकांशत: ग्रामीण हिंदी भाषी परिवेश में प्राथमिक स्कूल जो कि प्रारंभिक शिक्षा के केंद्र माने जाते हैं, वहां हिंदी माध्यम से ही विद्यार्थियों की नींव पड़ती है और वह आगे चल कर योग्यता के सभी मानकों को पूरा करते हुए यूपीएससी की परीक्षा में भाग लेता है, लेकिन आखिरकार वह प्रारंभिक परीक्षा में ही प्रथम और द्वितीय प्रश्न-पत्र सीसैट को उत्तीर्ण न कर पाने के कारण बाहर हो जाता है, क्योंकि प्रश्न-पत्रों को अंग्रेजी माध्यम से तैयार कर उसको फिर हिंदी में अनुवादित किया जाता है। इससे शब्दों का गूढ़ अर्थ हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों की समझ से परे होता है।

भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है और प्रतिवर्ष हिंदी दिवस भी मनाया जाता है। पर क्या सिर्फ हिंदी दिवस को मनाने या संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने से उसको वह सम्मान प्राप्त हो सकता है, जिसकी वह अधिकारी है? भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी है और हिंदी भाषी अभ्यर्थियों के यूपीएससी की परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन न कर सकने से क्या भविष्य में हिंदी भाषा का अस्तित्व यथावत रहेगा या इसमें कोई परिवर्तन होगा, यह विचारणीय प्रश्न है। यूपीएससी द्वारा अंग्रेजी माध्यम के साथ साथ हिंदी माध्यम को भी तरजीह देते हुए दोनों भाषाओं के समन्वय से हिंदी माध्यम के प्रतिभागियों में फैली निराशा को दूर किया जा सकता है, जिससे उनका चयन भी सुनिश्चित हो सके और वे भी देश के प्रशासन में अपनी योग्यता और हुनर के साथ भाग लेते हुए देश के विकास में योगदान दे सकें।
’शशिभूषण बाजपेयी, बहराइच, उप्र

प्रकृति का कोप
जलवायु परिवर्तन, जैसा समझा जाता था कि ये अभी हमसे बहुत दूर है। मगर 2020 में ही दावानाल का विकराल रूप देखा। आस्ट्रेलिया की आग अभी बुझा ही थी कि अमेजन के जंगलों में उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तटों जैसे कैलिफोर्निया, आॅरेगोन और वाशिंगटन के बाद रूस के साइबेरिया के सैकड़ों स्थान अब भी जल रहे हैं। पहले जहां का तापमान माइनस डिग्री में हुआ करता था, आज वहां लोगों के पसीने छूट रहे हैं। इंसानों की जान कम गई, मगर अनगिनत वन्य प्राणियों को हमने खो दिया है। आग के बाद बाढ़ ने कहर बरपाया है। समृद्ध देश इटली और फ्रांस में बाढ़ के पानी से जानमाल की खूब बर्बादी हुई। चीन और अफ्रीका के कई भाग, जहां पहले बाढ़ नहीं आए थे, उन क्षेत्रों में जल प्रलय देखने को मिला। दुनिया भर के शासकों द्वारा अब भी जलवायु परिवर्तन पर सिर्फ भाषण दिया जा रहा है। ठोस कदम उठाने के स्थान पर औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं।
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, झारखंड

बदलता परिदृश्य
बदलते परिदृश्य में सब कुछ बदलता चला गया। बच्चे तो हैं, मगर बचपन गुम हो गया। दादी-नानी, मां लोरियां और कहानियां सुनाती थीं तो ज्ञानार्जन में वृद्धि होती थी। कोलाहल से दूर एकाग्रता का समावेश होता था। मीठी नींद, जो अच्छे स्वास्थ्य का सूचक होती, वह इनसे प्राप्त होती थी। लेकिन वर्तमान में इलेट्रॉनिक दुनिया की भागदौड़ भरी व्यस्तम जिंदगी में बच्चों के लिए साथ बिताने का समय लोग नहीं निकाल पाते। इसके अलावा रिश्तेदारी का व्यावहारिक ज्ञान भी पीछे छूट गया है। कहानी से कल्पनाओं की उत्पत्ति होती थी, वहीं मातृत्व दुलार भी सही तरीके से प्राप्त होता। अब यह चिंता सताने लगी है कि कहीं कहानियां सुनाने की प्रथा विलुप्त न हो जाए, बच्चे लाड़-प्यार और कहानियों से वंचित न हो जाएं।
’संजय वर्मा ‘दृष्टि’, मनावर, धार, मप्र

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