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सेहत के सामने

क्या वास्तव में आज व्यक्ति अपनी सेहत को लेकर इतना लापरवाह हो गया है? क्या सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाएं इतनी लचर हो चुकी हैं कि लोग ढोंगी बाबाओं आदि की शरण में जाने लगे हैं?..

नई दिल्ली | December 22, 2015 12:01 AM
देश की छह फीसद से अधिक आबादी किसी न किसी प्रकार के मानसिक असंतुलन की शिकार है। (फाइल फोटो)

स्वास्थ्य, समाज और सरकार (18 दिसंबर) लेख में कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं। ऐसे सवाल जो वर्तमान समाज के सामने गंभीर चुनौती बन कर खड़े हैं। क्या वास्तव में आज व्यक्ति अपनी सेहत को लेकर इतना लापरवाह हो गया है? क्या सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाएं इतनी लचर हो चुकी हैं कि लोग ढोंगी बाबाओं आदि की शरण में जाने लगे हैं? जो भी हो, पर इन प्रश्नों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। उपचारात्मक स्वास्थ्य को बढ़ावा देना बाजार-तंत्र की एक साजिश है जो किसी भी समाज के लिए ‘धीमे जहर’ के समान है। यह वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली कई नस्लों को बर्बाद कर रही है।

यह इसी बाजार द्वारा मुहैया कराई जा रही व्यवस्था का नतीजा है कि आजकल लोग, खासकर युवा वर्ग कुछ भी ऊटपटांग और हानिकारक खाने-पीने से परहेज नहीं करता। उसे पता है कि अगर उसे कुछ हो भी जाता है तो कोई न कोई चिकित्सक उसे फिर स्वस्थ कर देगा। नई फास्ट फूड पीढ़ी अपने शरीर और स्वास्थ्य को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है। यह स्वास्थ्य के प्रति की जा रही लापरवाही का परिणाम ही है कि आज भारतीय समाज के अठारह से पच्चीस साल का युवा भी मोटापे, उच्च या निम्न रक्तचाप, मधुमेह, अवसाद जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार है।

जैसे-जैसे सेहत से संबंधित समस्याएं बढ़ रही हैं, उसी तेजी से इन बीमारियों से निजात दिलाने का झूठा दावा करने वालों की दुकानें और उनका व्यापार भी फल-फूल रहा है। बड़े शहरों से लेकर कस्बों तक में मोटापा दूर करने वाले, गोरा-सुंदर और छरहरा बनाने वाले पोस्टर, बैनर और विज्ञापनों की भरमार दिखती है। प्राकृतिक उपायों और अंदरूनी सौंदर्य से विलग होकर बाहरी सुंदरता की मृग-मरीचिका ने सौंदर्य प्रसाधनों और फिर कॉस्मेटिक क्लीनिक के बाजार को खूब समृद्ध किया है।

सवाल है कि क्यों नहीं हम अपने सेहत को लेकर इतने सजग रहें कि उपचार कराने की गुंजाइश कम से कम रह जाए? क्यों नहीं अधिकतर प्राकृतिक तरीकों को अपनाते हुए पहले से ही शरीर को सुरक्षित रखने के कारगर उपाय तलाशे जाएं, अपनी दिनचर्या में शारीरिक श्रम को स्थान दिया जाए, फास्ट-फूड के स्थान पर घर में पकाई चीजों का सेवन किया जाए? भागदौड़ भरे जीवन और व्यस्त दिनचर्या के बीच से ही अगर हर व्यक्ति विवेक का प्रयोग करते हुए सेहत के लिए कुछ समय निकाले तो बाजार और उसके दुश्चक्र को भी आसानी से तोड़ा जा सकता है। एक स्वस्थ जीवनशैली ही आने वाली पीढ़ियों के स्वस्थ भविष्य का निर्माण करेगी। (शिप्रा किरण, जामिया,नई दिल्ली)

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किताबों की जगह

कहा जाता है कि किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। ज्ञान-विज्ञान हो या सामाजिक परिदृश्य, हर चीज को जानने-समझने का एक बेहतर जरिया किताबें हैं। अच्छी पुस्तकें हमें जीवन जीने का रास्ता दिखाती हैं। हमारे अंदर कल्पना शक्ति, स्मृति क्षमता, विचारशीलता, रचनात्मकता जैसे तत्त्वों में वृद्धि का कारण बनती हैं। चाहे वह कोई लघु कहानी हो, नाटक-उपन्यास हो या कोई मनोरंजक कहानी हो, हर किसी में एक सीख छिपी होती है। किताबें हमें एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। कई शोधों में पाया गया है कि पुस्तकें न केवल हमारे मानसिक, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी काफी उपयोगी हैं। किताबों से दूरी बनाने का सीधा मतलब है अपने पढ़ने-लिखने की कला और योग्यता में कमी लाना।

आज दौर विज्ञान और तकनीक का है। हर हाथ में मोबाइल और इंटरनेट की सुविधा है। मनोरंजन के लिए घर में टीवी जैसे उपकरण है। जिंदगी अब इतनी भाग-दौड़ भरी हो चुकी है कि किसी के पास पुस्तक पढ़ने का वक्त नहीं। ऐसे में आज का समाज साहित्य और पुस्तकों से दूर हो रहा है। एक जमाना था जब लोग अपने प्रिय लेखक की किताबों का इंतजार करते थे। किसी भी विषय को गहराई से समझा जाता था। मगर आज के दौर में बहुत कुछ बदल चुका है। आज परीक्षा में पास होने के लिए तो विद्यार्थी किताबें पढ़ते हैं, लेकिन वैसे लोग बहुत कम होते हैं जो अपना ज्ञान बढ़ाने, जीवन से संबंधित अन्य बातों की जानकारी के लिए समय निकाल कर पुस्तकें पढ़ना पसंद करते हैं। अगर हमारा समाज किताबों से दूर होता गया तो आने वाले समय में बच्चों की ऐसी पीढ़ी होगी, जिसके लिए पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त करना अबूझ पहेली होगा। (विमल ‘विमर्या’, देवघर, झारखंड)

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जिम्मेदार कौन

पिछले दिनों एक खबर आई कि देश की राजधानी दिल्ली के पूर्वी क्षेत्र में स्कूलों की स्थिति इतनी खराब है कि वहां के छात्र और छात्राओं को बुनियादी सुविधाएं, जैसे बैठने के लिए बेंच, लिखने के लिए चॉक जैसी चीजें भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। दूसरी ओर, दिल्ली के अन्य क्षेत्रो में कंप्यूटरीकृत शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है। तो सोचने वाली बात यह है कि जब देश की राजधानी में यह हाल है तो ओड़िशा या छत्तीसगढ़ या झारखंड जैसे राज्यों के दूरदराज के इलाकों में क्या उम्मीद की जाए। सवाल है कि इसके लिए आखिरकार कौन जिम्मेदार है? संबंधित इलाकों की सरकारें, जो विद्यालय की सुविधाओं के लिए जरूरी धन उपलब्ध नहीं करा पा रही हैं या फिर विद्यालय का प्रशासन, जो भ्रष्चाचार में लीन होकर विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रख कर उनके भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है? (हिमांशु तिवारी, दिल्ली विवि, दिल्ली)

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ताप की आंच

भारत में ग्लोबल वार्मिंग का असर अब साफ नजर आने लगा है। पिछले दिनों बेमौसम बरसात और बर्फबारी के अलावा गंभीर बीमारियां भी सामने आर्इं, जिससे मौसम विज्ञानियों की भी चिंता बढ़ गई है। दुनिया के दो सर्वाधिक आबादी वाले देशों की राजधानियों में हवा का बुरा स्तर एक ओर विकास को जारी रखने और दूसरी ओर कोयले से चलने वाले बिजली घरों का प्रदूषण कम करने की चुनौती पेश कर रहा है। अगर हमने अब भी अपने पर्यावरण को दूषित होने से नहीं बचाया, तो आगे चल कर यह हमारे लिए ही एक आपदा बन कर उभरेगा। (शुभम साहू, होशंगाबाद)

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