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चौपालः जमीनी हकीकत

कानूनों का पालन कराने का अधिकांश जिम्मा पुलिस के पास होता है लेकिन उस वक्त न केवल हैरानी होती है बल्कि बहुत दुख भी होता है जब कोई पुलिस सब-इंस्पेक्टर अपनी शादी में दहेज के रूप में पच्चीस लाख रुपए नकद और महंगी कार लेता है।

Author October 8, 2018 3:58 AM
दागी जनप्रतिनिधियों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट अरसे से नाराजगी जताता रहा है। कुछ दिन पहले ही उसने दागी प्रतिनिधियों को रोकने के लिए संसद को कानून बनाने का निर्देश दिया है।

जमीनी हकीकत

क्षमा शर्मा का लेख ‘कानून लागू करने की चुनौती’ (3 अक्तूबर) हमारे देश में कानूनों की जमीनी हकीकत बयान करता है। भारत में तकरीबन सभी अपराधों को रोकने के लिए कानून हैं जिनका अगर ईमानदारी और दृढ़ता से पालन किया जाए तो यहां अपराध का नामोनिशान नहीं रहेगा। लेकिन विडंबना है कि कानून तो बहुत अच्छे हैं मगर उनका पालन कराने वाले प्रतिनिधि, अधिकारी, कर्मचारी उतनी ईमानदारी कभी नहीं दिखा पाते जितनी अपेक्षित होती है। यही कारण है कि संसद और न्यायपालिका के आसमान से उतर कर ये कानून जमीन पर आते ही किसी गुब्बारे की तरह फूट जाते हैं।

कानूनों का पालन कराने का अधिकांश जिम्मा पुलिस के पास होता है लेकिन उस वक्त न केवल हैरानी होती है बल्कि बहुत दुख भी होता है जब कोई पुलिस सब-इंस्पेक्टर अपनी शादी में दहेज के रूप में पच्चीस लाख रुपए नकद और महंगी कार लेता है। पुलिस कांस्टेबल तक दस-दस लाख रुपए दहेज की मांग करते हैं जबकि दहेज प्रथा रोकने वाली ‘498 ए’ जैसी धाराओं की पैरवी यही पुलिसवाले करते हैं। एक शिक्षक को जहां दहेज जैसी कुप्रथा रोकने के लिए लोगों को जागरूक करना चाहिए वहां वे खुद सरकारी नौकरी के घमंड में पंद्रह-बीस लाख की एक मोटी रकम दहेज के रूप में लेते हैं। ये कोई मनगढंत बातें नहीं हैं बल्कि समाज की जमीनी हकीकत यही है। जिसकी जितनी बड़ी सरकारी नौकरी, उसकी उतनी ही बड़ी दहेज की मांग! हालांकि सब लोग ऐसे नहीं हैं पर सच यही है अधिकांश ऐसे ही हैं।

एक सवाल यह भी है जिस देश की लोकसभा और विधानसभाओं में बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि दागी और आपराधिक पृष्ठभूमि के हों वहां कानूनों को लागू करने में किस सीमा तक ईमानदारी बरती जा सकेगी? दागी जनप्रतिनिधियों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट अरसे से नाराजगी जताता रहा है। कुछ दिन पहले ही उसने दागी प्रतिनिधियों को रोकने के लिए संसद को कानून बनाने का निर्देश दिया है। अब देखना होगा कि संसद क्या कानून बनाती है और बनाती भी है या नहीं! इस समय संसद के लिए ऐसा कानून बनाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा।

निशा रजक, बानौली-दतिया, मध्यप्रदेश

पहुंच से दूर

शिक्षा के मुख्य साधन के रूप में पाठ्यपुस्तक का प्रमुख स्थान है। इसके जरिए विद्यार्थी को निर्धारित विषय का पूरा ज्ञान हो जाता है। जहां पाठ्यपुस्तकें अध्यापक की पूरक हैं वहीं अध्यापकों की पथ प्रदर्शिका का कार्य भी करती हैं। बिहार के सरकारी विद्यालयों में नामांकित सभी विद्यार्थियों के बीच पाठ्यपुस्तकों का निशुल्क वितरण एक सराहनीय प्रयास था जिससे सभी बच्चे सीधे लाभान्वित होते थे। निस्संदेह सरकार के समक्ष समय पर पाठ्यपुस्तकों के प्रकाशन और वितरण का काम एक चुनौती था। लेकिन अब नई प्रणाली के रूप में सरकार ने पाठ्यपुस्तक खरीदने के लिए सीधे नामांकित छात्र-छात्राओं, उनके माता-पिता या अभिभावकों के खाते में राशि भेजने का जो निर्णय लिया है, कितना सार्थक होगा यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है, पर इतना स्पष्ट है कि इससे शिक्षकों और बैंककर्मियों के काम में इजाफा हुआ है। अभिभावकों की उदासीनता से पाठ्यपुस्तकें आज भी ज्यादातर बच्चों की पहुंच से दूर हैं। शिक्षा विभाग के फरमान का असर शिक्षकों पर हो सकता है लेकिन जनता पर उसका कोई असर नहीं हुआ है। इसलिए निशुल्क पाठ्यपुस्तक वितरण की जो व्यवस्था थी उसे फिर बहाल करने की आवश्यकता है ताकि सुगमतापूर्वक बच्चों को किताबें मिल सकें और वे अपनी शिक्षा जारी रख सकें।

मंजर आलम, रामपुर डेहरु, मधेपुरा, बिहार

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