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सावधानी के कदम

देश में कोरोना महामारी की दूसरी लहर फिलहाल कम हुई है और इसी के चलते सरकारों ने पूर्णबंदी में थोड़ी ढील देनी शुरू की है।

भारत में पहली बार कोरोना विषाणु का बी.1.617 स्वरूप अक्टूबर 2020 में रिपोर्ट किए गए थे। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

देश में कोरोना महामारी की दूसरी लहर फिलहाल कम हुई है और इसी के चलते सरकारों ने पूर्णबंदी में थोड़ी ढील देनी शुरू की है। कोरोना के बुनियादी नियमों का पालन करते हुए अब धीरे-धीरे बाजार खोलने की भी अनुमति दी गई है तो वहीं पचास फीसद की क्षमता के साथ दफ्तरों को खोलने की भी अनुमति मिल गई है। लेकिन सवाल यह उठता है कि सरकार का ध्यान शहरों में संचालित होने वाले कोचिंग संस्थानों पर क्यों नहीं जाता? वर्तमान महामारी में इस क्षेत्र पर बहुत ही नकारात्मक प्रभाव पड़ा है और इनके लिए न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारों ने किसी तरह के मुआवजे की घोषणा की है और न इनकी वित्तीय स्थिति पर ध्यान दिया है।

सरकारों को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि इन संस्थानों का योगदान शिक्षा क्षेत्र के अलावा अर्थव्यवस्था में भी उतना ही है, जितना अन्य क्षेत्रों का। इसलिए अब जरूरत है कि सरकारों को कोचिंग संस्थानों के खोलने पर भी विचार करना चाहिए। शहरों में अधिकतर संचालित होने वाले कोचिंग संस्थान किराए के भवनों में चलते हैं, जिसके भुगतान के लिए कोचिंग संस्थानों को बहुत ही वित्तीय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकारों को चाहिए कि वह बाजार, दफ्तर आदि की तरह पचास फीसदी क्षमता के साथ इन संस्थानों को खोलने की अनुमति दें। आर्थिक और रोजगार की दृष्टि से भी यह एक सकारात्मक फैसला होगा, साथ ही यह बच्चों के लिए भी लाभदायक होगा, क्योंकि बच्चे महीनों से घरों में कैद हैं और उन्हें एक ऐसा वातावरण नहीं मिल रहा है, जिसके वे सालों से अभ्यस्त हैं।

इस तरह नियमित पढ़ाई शुरू होने से बच्चों पर मानसिक दबाव काफी हद तक कम होगा। हालांकि इस पर कुछ लोग कहते हैं कि इससे कोरोना संक्रमण बढ़ सकता है। निश्चित रूप से संक्रमण के फैलाव को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत है। लेकिन अगर दूसरे क्षेत्रों में सावधानी के साथ गतिविधियां संचालित की जा सकती हैं तो इस क्षेत्र में यह प्रयास क्यों नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि इस क्षेत्र से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित और जागरूक होता है। इसलिए ऐसे संस्थानों में नियमों का पालन कराना अन्य क्षेत्रों के मुकाबले और भी आसान होता है। इनमें बाजारों की तरह बेलगाम भीड़ नहीं होती है और संख्या भी निश्चित होती है। इसलिए इन संस्थानों में कोरोना के बुनियादी नियमों का पालन कराना भी आसान होगा।
’सौरव बुंदेला, भोपाल, मप्र

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