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चौपालः किसानों की खातिर

राजस्थान में हाड़ौती सहित अन्य क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण उड़द व सोयाबीन की फसलें बर्बाद हो चुकी हैं और सरकार पूंजीपतियों-व्यापारियों को फायदा पहुंचाने के लिए समर्थन मूल्य पर खरीद में देरी कर रही है।

Author Published on: October 3, 2018 2:49 AM
प्रतीकात्मक चित्र

किसानों की खातिर

राजस्थान में हाड़ौती सहित अन्य क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण उड़द व सोयाबीन की फसलें बर्बाद हो चुकी हैं और सरकार पूंजीपतियों-व्यापारियों को फायदा पहुंचाने के लिए समर्थन मूल्य पर खरीद में देरी कर रही है। किसान उड़द को 2000 प्रति क्विंटल के हिसाब से बाजार में बेचने को मजबूर हैं जबकि सरकार ने उसका समर्थन मूल्य 5600 रुपए घोषित कर रखा है। आमदनी का अन्य साधन नहीं होने के कारण छोटे किसान को कर्ज देने वाले लोग न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होते ही उस पर वसूली का दबाव बनाते हैं जिससे मजबूर होकर उसे तुरंत अपनी पैदावार बेचनी पड़ती है। इसके मद्देनजर सरकार को फौरन किसान हित में फैसला लेते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद शुरू करनी चाहिए। जब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य गारंटी अधिनियम और फसल खरीद का वार्षिक कैलेंडर नहीं बनेगा, तब तक किसानों की इन समस्याओं का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। इसलिए सरकार को जल्द से जल्द न्यूनतम समर्थन मूल्य गारंटी अधिनियम व फसल खरीद का वार्षिक कैलेंडर जारी करना चाहिए।

हरेंद्र सिंह कीलका, सीकर

अधूरी आजादी

इन दिनों कहा जा रहा है कि स्त्री की स्वतंत्रता उसके पर्स में होती है। क्या वास्तव में स्त्री आर्थिक रूप से समर्थ होने के बाद समाज के बंधनों को तोड़कर स्वतंत्र जीवन जी पाती है? मुझे लगता है, नहीं क्योंकि आज हर वर्ग की स्त्रियां बाहर निकल कर कार्य कर रही हैं पर क्या वे अपने मन मुताबिक जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं? आज स्त्री घर के साथ-साथ बाहर भी कार्य कर रही है फिर भी हर दिन कई स्त्रियां घरेलू हिंसा और पारिवारिक तनाव का दंश झेल रही हैं। क्या उनकी आर्थिक संपन्नता उन्हें समाज की रूढ़ियों से आजाद करने में सफल हुई है? बहुत हद तक शायद नहीं।

इसका कारण स्पष्ट है कि महिलाएं अभी मानसिक रूप से पितृसत्तात्मक विचारधारा से मुक्त नहीं हो पाई हैं। स्त्री चाहे लाख कोशिश कर ले आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की, लेकिन जब तक वह मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होगी उसकी आजादी अधूरी है। जिस समाज में हम रह रहे हैं वहां स्त्री का जीवन ही अभी सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में उसकी स्वतंत्रता और अधिकारों की बात करना बेमानी है।

काजल, दिल्ली विश्वविद्यालय

शिक्षा की उपेक्षा

हाल ही में हुए विश्व आर्थिक मंच के एक सर्वे के अनुसार शिक्षा पर खर्च करने में भारत दुनिया में 136 वें पायेदान पर है, जबकि नार्वे इस सूची में पहले पायदान पर है। वह अपने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का छह फीसद शिक्षा पर खर्च करता है, जबकि भारत अपने जीडीपी का सिर्फ 2.7 फीसद खर्च करता है। 1964-66 में तत्कालीन यूजीसी अध्यक्ष दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में बने कोठारी आयोग ने अपनी रिपोर्ट ‘शिक्षा और राष्ट्रीय विकास’ में सरकार को शिक्षा क्षेत्र में जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च करने की सलाह दी थी। इसके अलावा 2006 में शिक्षा में सुधार को लेकर बनी सैम पित्रौदा समिति ने भी इस क्षेत्र में जीडीपी का छह फीसद खर्च करने की ही सलाह दी थी।

लेकिन सरकारों ने आयोग और समिति के सुझावों को ताक पर रखते हुए शिक्षा क्षेत्र का कुल बजट कभी जीडीपी का 3.5 प्रतिशत भी नहीं होने दिया। इस साल बजट सत्र में सरकार ने कुल 85 हजार 10 करोड़ रुपए दिए, जोकि जीडीपी का सिर्फ 2.7 प्रतिशत है। इससे पहले 2012-13 में शिक्षा का बजट जीडीपी का 3.1, 2014-15 में 2.8 और 2015-16 में यह जीडीपी के सिर्फ 2.4 फीसद पर आ गया था। शिक्षा क्षेत्र में बजट की कमी के चलते शिक्षा की गुणवत्ता में भी कमी आई है। बजट की कमी भारत को विश्वगुरु बनने की राह में रोड़ा साबित होगी।

ऋषि कांत, इटावा, उत्तर प्रदेश

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