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चौपाल: आंकड़ों से गायब

नोटबंदी के समय कितने रुपए किस खाते में जमा किए गए, इसकी सूचना जब सरकार दे सकती है तो उसे यह सूचना भी देनी चाहिए कि कितने डॉक्टरों की जान गई।

Parliament Monsoon Session LIVE Updates, Parliament Monsoon Sessionकोरोना वायरस महामारी से जुड़े दिशानिर्देशों का पालन करते हुए सोमवार को संसद के मानसून सत्र का प्रारंभ हुआ। (फोटोः PTI)

संसद के मौजूदा सत्र में प्रश्न प्रहर में कटौती की गई है। इस बीच आवश्यक बिंदुओं पर बहस के दौरान तमाम प्रश्न, प्रतिप्रश्न पूछे गए, पर ताज्जुब हुआ कि सरकार के पास आंकड़ों का नितांत अभाव है। वैसे संविधान की शपथ लेकर संसद और विधान सभाओं में कोई गलत बयानबाजी नहीं की जा सकती है। सदन में निश्चित रूप से सही सूचना दी जाती है, चाहे वह सरकार के पक्ष में हो या सरकार के विरुद्ध। जब चीन द्वारा अतिक्रमण की बात स्वीकारी गई तो अन्य आंकड़ों की मनाही का प्रश्न ही नहीं उठता।

आज सारे काम आॅनलाइन हो रहे हैं। यह अलग बात है कि कौन इसके दायरे से बाहर हो रहा है। कोरोना काल मे डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के अकाल मृत्यु के आंकड़े न होने पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा कड़ी आपत्ति दर्ज की गई, क्योंकि कोरोना योद्धाओं के प्रति यह असम्मान प्रदर्शन के समान है। कोरोना महामारी के शुरुआती दौर में डॉक्टरों के सम्मान में हेलीकॉप्टर से फूल बरसाए गए थे, ताली-थाली पीट कर और प्रकाश कर उनका सम्मान किया गया था। कोरोना के दौरान मृतकों को मुआवजा देने पर सहमति जताई गई थी। पर जब डॉक्टरों या आप्रवासी मजदूरों की त्रासदी से संबंधित आंकड़े ही नहीं होंगे तो मुआवजा देने का अवसर ही नहीं बनेगा। आखिर सरकार का मकसद और उसकी मंशा क्या है?

सच यह है कि आंकड़े सरकार अगर चाहती तो इकट्ठा कर सकती थी। पूरे देश मे फैले कार्यालयों से आॅनलाइन सूचना आ सकती थी। कल-कारखानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से भी आॅनलाइन आंकड़े प्राप्त किए जा सकते थे। केवल असंगठित क्षेत्र के आंकड़े प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती थी। आप्रवासी मजदूरों को मनरेगा में काम दिए जाने की सूचना तो सरकार के पास होनी ही चाहिए। कितने आप्रवासी मजदूर अपने गांव लौट गए, कितने रास्ते ही मर गए, कितनों को दोबारा रोजगार मिला- अगर ये आंकड़े नहीं होंगे तो मुआवजे की बात भी नहीं उठाई जा सकेगी।

वैसे सरकार के पास तरह-तरह के आंकड़े होते हैं। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर सरकार अपना बचाव भी करती है। नोटबंदी के समय कितने रुपए किस खाते में जमा किए गए, इसकी सूचना जब सरकार दे सकती है तो उसे यह सूचना भी देनी चाहिए कि कितने डॉक्टरों की जान गई, कितने पैरा मेडिकल स्टॉफ खेत रहे, कितने श्रमिकों की जान गई, कितनों को वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराए गए, कितना व्यय किया गया।

इसके अलावा, गांव जाकर कितने श्रमिक अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं कर पा रहे हैं और उनके लिए क्या क्या किया जा रहा है!
’एफएन प्रधान, लखनऊ, उप्र

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