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चौपालः सुधार की दरकार

जापान में एक कर्मचारी को महज इसलिए अपना वेतन कटवाना पड़ा कि वह दोपहर के भोजनावकाश में तीन मिनट पहले चला गया था। यही नहीं, वरिष्ठ अधिकारियों ने इस लापरवाही के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांगी।

Author Published on: June 28, 2018 3:42 AM
समय-समय पर वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार द्वारा कामचोर कर्मचारियों पर नकेल कसने के आदेश दिए जाते हैं जिनका कोई विशेष लाभ नहीं होता।

जापान में एक कर्मचारी को महज इसलिए अपना वेतन कटवाना पड़ा कि वह दोपहर के भोजनावकाश में तीन मिनट पहले चला गया था। यही नहीं, वरिष्ठ अधिकारियों ने इस लापरवाही के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांगी। यह खबर पढ़ कर हमें लग रहा होगा कि क्या अजीब लोग हैं; तीन मिनट पहले लंच करना भी क्या इतना बड़ा अपराध हो गया कि उसके लिए वेतन कटे या माफी मांगनी पड़े! ऐसा सोचने में हम लोगों की कोई गलती भी नहीं है क्योंकि हमने जो सरकारी कामकाज अपने जीवनकाल में देखा है वह बिल्कुल अलग है। भारत में सरकारी दफ्तरों का कामकाज भगवान भरोसे ही चलता है। यही धारणा हम सबके दिलोदिमाग पर छाई हुई है और किसी हद तक यह सच भी है। सुबह सरकारी कर्मचारियों का देर से दफ्तर पहुंचना आम बात है खासकर उन कर्मचारियों का जो सीधे लोगों को सेवाएं नहीं देते। पहुंचने के बाद चाय का दौर चलता है। लंच की खुमारी भी समय से पहले ही छा जाती है। लंच के बाद ऊंघाए हुए से लोगों का सरकारी दफ्तरों में कुर्सियों पर पसरे दिखना एक आम बात है। ऐसे गैर-पेशेवराना और गैर-जिम्मेदार कामकाजी व्यवस्था से आम लोगों को रोज दो-चार होना पड़ता है और वे इसके आदी भी हो गए हैं।

ऐसा नहीं है कि इस व्यवस्था में ईमानदार और जिम्मेदार कर्मचारी नहीं हैं पर काम के अत्यधिक दबाव और अन्य संबंधित तनावों के कारण उनकी हिम्मत भी कभी-कभी जवाब दे जाती है। वरिष्ठ अधिकारी भी उन्हीं कर्मचारियों को काम देते हैं जो मेहनत और ईमानदारी से अपना काम करते हैं नतीजतन, उन पर काम का दबाव ज्यादा रहता है। काम करने के बावजूद प्रशंसा न मिलने के कारण ये कर्मचारी भी धीरे-धीरे उदासीन हो जाते हैं और खुद को बेवकूफ समझने लगते हैं। दूसरी तरफ कामचोर कर्मचारी बिना कुछ काम किए उतना ही वेतन लेते रहते हैं। सबसे ज्यादा खराब स्थिति सरकारी विभागों में लगे संविदाकर्मियों की है जो कम वेतन और बिना किसी सुविधा के काम करते हैं और प्रशासन द्वारा भी उन्हें बाहर का व्यक्ति समझ भेदभाव किया जाता है।

समय-समय पर वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार द्वारा कामचोर कर्मचारियों पर नकेल कसने के आदेश दिए जाते हैं जिनका कोई विशेष लाभ नहीं होता। जो अधिकारी इन आदेशों के पालन के लिए जिम्मेदार होते हैं वही अपनी कुर्सियों से नदारद रहते हैं। ये अधिकारी सभी कानून अपने मातहतों पर लागू करना चाहते हैं लेकिन खुद उससे अलग रहना चाहते हैं। कानून सबके लिए एक है, सभी को काम करने का पैसा मिलता है चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो। मगर भारत में अभी भी बड़े पदाधिकारी खुद को आम लोगों से बड़ा समझते हैं और भूल जाते हैं कि इन्हीं आम लोगों द्वारा दिए गए करों से उन्हें वेतन और अन्य सुविधाएं मिलती हैं। अधिकारियों का समय अपने अधीन कार्य कर रहे कर्मियों को जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने के बजाय अपने वरिष्ठ अधिकारियों की चमचागीरी में निकल जाता है जिससे आपसी तालमेल में कमी आती है।

बहरहाल, हमें इस सामंतवादी व्यवस्था से बाहर निकलने के उपाय तलाशने होंगे और समझना होगा कि सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले प्रत्येक कर्मचारी की जवाबदेही जनता के प्रति है जिससे वह बच नहीं सकता। शुरुआत खुद से ही करनी पड़ेगी। ईमानदार और जिम्मेदार कर्मचारियों को समय-समय पर तरक्की और प्रशंसा भी बेहतर व्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण है। दिन-रात अपने काम में लगे संविदाकर्मियों के लिए नीतिगत सुधार करना बहुत आवश्यक है जिससे उन्हें भी लगे कि वे भी व्यवस्था का जरूरी हिस्सा हैं।

अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, उत्तम नगर, नई दिल्ली

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