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घड़ियाली आंसू

कितना विचित्र और हास्यास्पद है नेताओं का यह कहना कि केंद्र सरकार बदले की भावना से सीबीआइ का दुरुपयोग कर रही है...

Author Updated: September 29, 2015 10:48 AM

कितना विचित्र और हास्यास्पद है नेताओं का यह कहना कि केंद्र सरकार बदले की भावना से सीबीआइ का दुरुपयोग कर रही है जबकि वही नेता अपने विपक्षियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप पर ही सीबीआइ जांच की मांग का राग अलापते रहते हैं। हां, यह सही है कि सीबीआइ केंद्र के हाथ में है और केंद्र की सरकारें समय-समय पर इसका उपयोग अपना हित साधने के लिए करती रही हैं। दुरुपयोग की बानगी तब दिखी थी जब कांग्रेस और द्रमुक के गठबंधन का खात्मा हुआ था।

उसी के एक दिन बाद सीबीआइ ने करुणानिधि के बेटे एमके स्टॉलिन के घर छापेमारी की थी। उस दिन सीबीआइ की नीयत और कार्रवाई के समय पर सवालिया निशान लगा और दुरुपयोग के आरोपों को बल मिला। ऐसे कई उदाहरण हैं। पर हर बार ऐसा ही हो यह जरूरी नहीं। ताजा मामला राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) घोटाले का आरोप झेल रहीं बसपा सुप्रीमो और उनके तत्कालीन कैबिनेट सहयोगी बाबू सिंह कुशवाहा से सीबीआइ की पूछताछ का है। मायावती ने तत्काल प्रभाव से संवाददाता सम्मेलन कर दलित होने के कारण परेशान करने का आरोप केंद्र सरकार पर मढ़ा।

बसपा सुप्रीमो का राजनीति करने का यह पुराना तरीका है। ताज कॉरिडोर मामले में भी जब-जब उनसे पूछताछ की संभावना बनती थी तो भी वे ऐसे ही घड़ियाली आंसू बहाया करती थीं। बहनजी से यह सवाल तो बनता ही है कि अगर आप पाक-साफ हैं तो डरने की बात क्या है? आप डट कर सामना कीजिए। दरअसल, चार साल पुराने इस मामले में घेरेबंदी से पूरी पार्टी बचाव की मुद्रा में आ गई है और खुद मायावती सकते में हैं।

बहनजी की परेशानी की अपनी वजह भी है। आज उनके पास न तो राज्य में सत्ता है और न केंद्र में उनकी सौदे वाली स्थिति है क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी का पुलिंदा शून्य पर सिमट कर रह गया था। बसपा सुप्रीमो इतने दिनों तक तो यूपीए सरकार से अपने सांसदों की सौदेबाजी करती आ रही थीं पर अब मामला प्रतिकूल हो गया है सो बहनजी असहाय दिख रही हैं। राज्य विधानसभा चुनाव करीब है, तो उसकी परेशानी अलग।

बहनजी चुनाव की तैयारी करेंगी या सीबीआइ से निपटेंगी, यह देखना दिलचस्प होगा और यही है मायावती की परेशानी। बहनजी की आदतों में शुमार रहा है सत्ता पर आरोप लगाना और फिर उसी सत्ताधारी दल को मौन समर्थन देना। हालांकि देश ने अब इन दलों-नेताओं के दोहरे चरित्र को समझना शुरू कर दिया है।
’केशव झा, दरभंगा, बिहार

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