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चौपालः जमीनी हकीकत

हमारे देश की अर्थव्यवस्था में पिछले कुछ अरसे से जिस प्रकार की उथल-पुथल देखने को मिली है वह काफी चिंताजनक है।

हमारे देश की अर्थव्यवस्था में पिछले कुछ अरसे से जिस प्रकार की उथल-पुथल देखने को मिली है वह काफी चिंताजनक है। पिछले कुछ दिनों से डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया बड़ी तेजी से कमजोर हो रहा है और रोजाना गिरावट का नया रिकॉर्ड कायम कर रहा है। अंतरराट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण देश में पेट्रोल और डीजल के दामों में भी रेकार्ड इजाफा हुआ है। इससे सरकार कई तरह की परेशानियों से घिरी हुई नजर आ रही है। वहीं दूसरी तरफ सरकार सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों के हवाले से बता रही है कि आर्थिक प्रगति के मामले में हमारा देश चीन को भी पीछे छोड़ चुका है। इन आंकड़ों के अनुसार इस तिमाही ‘अप्रैल-जून’ में भारत की विकास दर 8.2 फीसद तक पहुंच गई है जबकि चीन 6.7 फीसद से आगे बढ़ रहा है। मुमकिन है कि पहली तिमाही में इस रफ्तार के साथ भारत कुछ दिनों में इंग्लैंड को पीछे छोड़ कर बहुत जल्द दुनिया की पांचवीं तेज गति से विकास करती अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाए।

मगर देश के अंदर फिलहाल अर्थव्यवस्था के दो रूप नजर आ रहे हैं। एक तरफ रुपया तेजी से गिर रहा है जिसके कारण विदेशों में पढ़ने वाले छात्रों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है और आयातित सामान के दामों में वृद्धि हो रही है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई में उछाल देखा जा सकता है जिसकी वजह से लोगों की जेब पर असर पड़ रहा है। दूसरी ओर सरकार विकास की नर्ईऊंचाइयां छूने के दावे कर रही है। दरअसल, जीडीपी रिपोर्ट और जमीनी हकीकत में बहुत बड़ा फर्क है। हकीकत तो यह है कि देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती जा रही है मगर देश में महंगाई आसमान छूती जा रही है जिस पर लगाम लगाने में सरकार विफल दिख रही है। वैश्वीकरण के युग में अर्थव्यवस्था में तेजी और मंदी अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर करती हैं मगर किसी भी देश की सरकार अपने कौशल और सूझबूझ से महंगाई और आर्थिक घाटे पर नियंत्रण कर देश की अर्थव्यवस्था को संभाल सकती है। जरूरी है कि सरकार बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाने की कोशिश करे वरना जीडीपी के आंकड़ों का कोई खास मतलब नहीं रह जाएगा।

पीयूष कुमार, नई दिल्ली

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