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खेलों से दूर

जापान और अन्य देशों में हानिकारक प्लास्टिक के बजाय कागज के खिलौनों के विकास पर जोर दिया जा रहा है जबकि हम अपने बच्चों को बचपन से ही मोटर, कार, बाइक, तोप, तमंचे, रिवाल्वर, रिमोट और एंड्रायड फोन की प्रतिकृति थमा कर आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं?

Author Published on: May 27, 2019 2:50 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

जब से बच्चों पर जिंदगी जीने से ज्यादा अधिक अंक लाने का दबाव बढ़ने लगा है तब से उनकी जिंदगी तनावपूर्ण हो गई है। परंपरागत खेलों के लिए अब बच्चों के जीवन में कोई जगह शेष नहीं रह गई है। लकड़ी, मिट्टी, कागज और पत्थर से बने खिलौने हमें अपने परिवेश से जोड़ते हैं। लेकिन अफसोस कि उनसे अब कोई नहीं खेलता। वे दिन लद गए जब बच्चे लकड़ी की काठी, काठी का घोड़ा… सुनकर बड़े होते थे। आज उनकी जिंदगी की शुरुआत स्मार्टफोन या ए फार एपल और बी फॉर बाल से होती है। जिन पंच तत्त्वों से मिल कर मानव शरीर बना है उनसे जुड़े खेल-तमाशे जब तक जिंदगी का हिस्सा रहेंगे तब तक तो जीवन ऊर्जा पाता रहेगा लेकिन जिनकी जिंदगी बंद कमरे में इंटरनेट के ब्लू व्हेल गेम, कार्टून के कृत्रिम खेल और वीडियो के आधुनिक खेलों में सिमट कर रह गई है उन्हें जीवन के लिए जरूरी ऊर्जा आखिर मिले तो कहां से! ये खेल बच्चों के जीवन का विकास के बजाय विनाश कर रहे हैं।

अब गुब्बारे, बांसुरी, सीटी, गिल्ली-डंडा, चौपड़, शतरंज, नट के खेल देखने को नहीं मिलते। ये पारंपरिक खेल-खिलौने जीवन को परिवेश और श्रमशीलता से जोड़ते हैं। लकड़ी के खिलौने जहां काष्ठकला के हुनर को बढ़ावा देते हैं वहीं पत्थरों पर की गई नक्काशी पाषाण कला से परिचित कराती है। मिट्टी के खिलौने जहां माटी कला के हुनर की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं वहीं कठपुतलियों के करतब राजस्थान के कलाकौशल की बानगी की झलक प्रस्तुत करते हैं। केरल में नृत्य करती लकड़ी की गुड़िया, आंध्र में नव विवाहित जोड़ों की मूर्तियां, बंगाल में लकड़ी के देवी-देवता बनाने का प्रचलन है। ये पारंपरिक खेल-खिलौने रचनात्मकता के साथ-साथ अलग-अलग प्रदेशों के कला-कौशल को भी दर्शाते हैं। जापान और अन्य देशों में हानिकारक प्लास्टिक के बजाय कागज के खिलौनों के विकास पर जोर दिया जा रहा है जबकि हम अपने बच्चों को बचपन से ही मोटर, कार, बाइक, तोप, तमंचे, रिवाल्वर, रिमोट और एंड्रायड फोन की प्रतिकृति थमा कर आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं?

देशी खेल-खिलौनों का बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास में अहम योगदान है। बच्चों को पारंपरिक खेल और परंपरागत खिलौनों से अलग करने का ही नतीजा है कि आज बच्चों से उनका बचपन छिनता जा रहा है। उनकी संवेदना और समझ में कमी आती जा रही है। स्वस्थ मस्तिष्क का निवास स्वस्थ शरीर में ही संभव है। संतुलित विकास के लिए खेलकूद आवश्यक है। खेल के मैदान के अभाव में शिक्षा से खेलों का महत्त्व घटता जा रहा है। ऐसे में बच्चों को खेलकूद से जोड़े रखने के प्रति अभिभावकों की जवाबदारी अहम हो जाती है। अनेक सर्वेक्षणों से यह बात साफ हो चुकी है कि निष्क्रिय बच्चों की तुलना में सक्रिय बच्चों में संज्ञात्मक कौशल का विकास तेजी से होता है। पारंपरिक खेल बच्चों में समूह संस्कृति और सामाजिक कौशल की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं। इनसे उचित अंग विन्यास और मांस पेशियों के समुचित विकास को बढ़ावा मिलता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि खेलकूद से रक्त संचरण में होने वाले सुधार से बच्चों का हृदय संबंधी व्यायाम स्वत: ही हो जाता है। धैर्य, एकाग्रता, खिलाड़ी भावना, सहनशीलता, जीवन मूल्यों की समझ भी बच्चों में खेलों के कारण आती है। इसलिए बच्चे खेल रहे हैं यही पर्याप्त नहीं है, वे किस तरह के खेल खेल रहे हैं, इस पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
’देवेंद्र्र जोशी, उज्जैन

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