ईंधन के दाम

देश में जिस प्रकार से पेट्रोल और डीजल के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, उसने आम नागरिकों के लिए भारी-भरकम बोझ बढ़ा दी है।

Bebak Bol
बढ़ती महंगाई ने मध्यवर्ग की कमर तोड़ दी है।

देश में जिस प्रकार से पेट्रोल और डीजल के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, उसने आम नागरिकों के लिए भारी-भरकम बोझ बढ़ा दी है। आज देश में पेट्रोल-डीजल की मूल कीमत चालीस रुपए के करीब है और बाजार में उसकी औसत कीमत सौ रुपए के करीब है। यानी राज्य और केंद्र सरकार, दोनों मिल कर जनता से साठ रुपए का कर लेती हैं। ऐसे में अगर एक देश, एक टैक्स हो जाता है, तो इसके दामों में जरूर कमी देखने को मिलेगी। दोनो सरकारें अगर चाहें तो जनता के लिए बोझ थोड़ी कम हो जाएंगी। केरल हाइकोर्ट के दलील के बाद एक आस जगी थी कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरों में लाया जाएगा, जिससे इसके भाव में कुछ कमी आएगी। लेकिन जब जीएसटी परिषद की बैठक हुई, उसमें राज्यों की आम सहमति नहीं बन पाई।

इस विषय में यह सवाल उठना लाजिमी है कि राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने से क्यों बचती हैं? क्या उन्हें जनता की चिंता नहीं होती है? कोरोना की मार क्या सिर्फ राज्य सरकार पर ही पड़ी है? क्या जनता ने कोरोना का दंश नहीं झेला है? इससे यह साफ पता चलता है कि समस्याएं कुछ भी आए तो उसका सारा भार जनता के माथे मढ़ दिया जाए। जब राज्य सरकारें चुनाव में कराड़ों-अरबों रुपए खर्च करती हैं, दूसरे मदों में करोड़ों रुपए फिजूलखर्ची में उड़ाती है, तो क्या उस समय आर्थिक स्थिति पर प्रभाव नहीं पड़ता है?

मगर जनता की बदहाली से इन्हेें शायद कोई फर्क नहीं पड़ता है। नेता लोग खुद वातानुकूलित दफ्तरों में बैठ कर आराम करते हैं, सड़क पर चलने के लिए एसी कार मिलता है। और तो और, जनता के कर से हवाई मार्ग का सफर भी हो ही जाता है। ऐसे में क्यों जनता की हित के लिए सरकार सोचेगी? पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से बाहर से आने वाले सभी सामान के दाम बढ़ गए हैं। कोरोना के कारण बहुत सारे लोगों की नौकरी छूट गई है, काम-धंधे ठप हो चुके हैं। ऐसे में उनके ऊपर क्या बीतता होगा? क्या कभी किसी ने सोचा? सरकारों को कम से कम अब पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाना चाहिए, ताकि लोगों को कम दाम में र्इंधन उपलब्ध हो पाए।
’शशांक शेखर, आइएमएस, नोएडा, उप्र

चुनावी वादे

चुनावी मौसम में राजनीतिक दलों के पास मुफ्तखोरी के ऐलान मतदाताओं को लुभाने के लिए बढ़िया हथियार होते हैं। मतदाता भी वादों के झांसे में आकर राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार हो जाता है। वादों का वास्तविक फायदा उन्हें मिले न मिले, पर इसमें बहुत सारे लोग बिना वजह से पिस जाते हैं। सरकार मुफ्तखोरी से बड़े खर्च की भरपाई टैक्स आदि बढ़ा कर लोगों से वसूलती है।

मुफ्त की घोषणा से लोगों की कार्य क्षमता भी घटती है और लोग पराश्रित होने लगते हैं। कमजोर आर्थिक हालात वाले लोगों को सुविधाओं के लालीपॉप देना सरकारों को बंद करना चाहिए, ताकि विषमता की खाई पाटी जा सके। उत्तर प्रदेश चुनाव के नजदीक देख आम आदमी पार्टी ने घरेलू उपभोक्ताओं को तीन सौ यूूनिट बिजली मुफ्त देने की घोषणा लखनऊ में की। इस तरह की घोषणाओं पर चुनाव आयोग को रोक लगाना चाहिए। कई बार नेता वादा करने के बाद भूल जाते हैं। यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि नेता अगर वादा करें तो उसे पूरा करें। उन्हें मुफ्त तोहफे देने के बजाय रोजगार के पुख्ता इंतजाम करना चाहिए।

’अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, मप्र

पढें चौपाल समाचार (Chopal News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट