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नेपाल से मैत्री

भारत ने हमेशा नेपाल को अपना एक परम मित्र मान कर उसकी तरक्की में सहयोग देने का प्रयास किया है।

पिछले कुछ समय से पाकिस्तान और चीन के कहने में आकर नेपाल ने भारत का अपमान करना प्रारंभ कर दिया था। इसके साथ ही वह भारत के कुछ हिस्सों पर अपना हक जताने लगा था। जबकि भारत ने हमेशा नेपाल की हर मुसीबत में मदद की है। शेर बहादुर देउबा के पहले वाली सरकार ने चीन के इशारे पर चलना शुरू कर दिया था। इस तरह भारत-नेपाल संबंधों में काफी खटास आ गई थी। पर सत्ता परिवर्तन और देउबा की सरकार बनते ही एक बार फिर संबंधों में सकारात्मक वातावरण बना है। प्रधानमंत्री मोदी ने इन मधुर रिश्तों को स्वीकार कर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया।

नेपाल को चाहिए कि वह भारत से अपने रिश्तों की डोर को मजबूती से थाम कर रखे, इसी में उसका फायदा है। जब-जब नेपाल ने चीन का दामन थामा है, चीन ने उसकी जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया है। भारत ने हमेशा नेपाल को अपना एक परम मित्र मान कर उसकी तरक्की में सहयोग देने का प्रयास किया है।
मनमोहन राजावत राज, शाजापुर

शोध बनाम सोच

अनुसंधान में गुणवत्ता की कसौटी (20 मई) में पीएचडी उपाधि हेतु भारत में किए जा रहे शोध की गुणवत्ता में वृद्धि हेतु कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे शोध की गुणवत्ता को बेहतर बनाने की आवश्यकता है। हमारे देश में शोध की परिभाषा को ही अपरिभाषित किया जा रहा है।

हमारे देश में ऐसे कितने लोग होंगे, जिन्होंने कभी स्कूल या कालेज का चेहरा तक नहीं देखा, वे किसी प्रयोगशाला में नहीं गए, उनके मार्गदर्शन के लिए कोई शोध निर्देशक नहीं थे, पर उन्होंने अपनी बुद्धि से, अपनी नवीन सोच से ऐसे-ऐसे उपकरण, विधियों और प्रक्रियाओं को ईजाद किया है, जिसने समाज की दिशा और दशा ही बदल दी है। पर इन खोजों और आविष्कारों की हमारे विश्वविद्यालयों को कोई आवश्यकता नहीं है।

हमारे देश में व्यक्ति जो काम करना चाहता है, उससे वही काम न करा कर बाकी सब काम कराए जा रहे हैं, तो कार्यों में नवीनता कहां से आएगी? हमारे शिक्षा तंत्र को समझना होगा कि पीएचडी या शोध सिर्फ विश्वविद्यालयों और प्रयोगशालाओं में नहीं होता, यह किसान के खेत में भी होता है, कुम्हार की दुकान, एक मोबाइल या मोटरसाइकिल ठीक करने वाले के यहां भी हो रहा है।

अनुसंधान और शोध के लिए डिग्री की नहीं, दिमाग को जरूरत होती है, नए विचारों की जरूरत होती है, किसी काम को नए ढंग से करने की जरूरत होती है। शायद यही कारण है कि विश्वविद्यालयों में किए गए शोध और उनके शोधग्रंथ पुस्तकालयों में धूल चाटते रहते हैं, कोई उन्हें पलटता तक नहीं। हमारी अनुसंधान और शोध प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है!
राजेंद्र कुमार शर्मा, रेवाड़ी, हरियाणा

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