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चौपाल: लाचार बचपन

रेलवे स्टेशन, फुटपाथ, बस अड्डों पर पाए जाने अनाथ बच्चों को जब कोई भी सहारा नहीं होता तो तब शायद स्थानीय प्रशासन उन्हें अनाथ आश्रमों में छोड़ कर चले जाते हैं। लेकिन हमारे देश में कई ऐसे शहर हैं, जहां उन अनाथ बच्चों को अपना कहने वाला कोई नहीं है।

ये वे बच्चे जो चाहते हैं कि हमें भी कोई अपना कहे और प्यार दे।

आंखें खोलते ही जिन्होंने खो दिया अपनों का साथ, उठ गया मां बाप का साया, नहीं रहा सिर पर किसी का हाथ, उनका क्या बिगाड़ेगा गमों का सैलाब। जिन्होंने पैदा होते ही खो दिया अपना बचपन। एकदम सूखी डाली के टूटे-बिखरे पत्तों जैसा होता है मासूम अनाथ बच्चों का बचपन। जिन्होंने ख्वाबों की बस्ती में कुछ कर गुजर जाने के सपने देखे होते हैं। आंखों में चमक होती है, पर खाने को दाना नहीं होता। सही गलत बताने को कोई साथ नहीं होता, क्योंकि इन्हें किसी ने पाला नहीं होता। ममता के प्यार से दूर, पिता की देखरेख से दूर होते हैं ये बच्चे। शायद रूठ गई है, इनकी मंजिल इनसे।

यह कड़वा सत्य है, पर सच है कि इन अनाथों का कोई ठिकाना नहीं होता। कहने को तो देश भर में कई बाल आश्रम हैं, पर इन मासूम अनाथ बच्चों का अपना घर कहने के लिए कोई घर भी नहीं है। बीते दिनों कई ऐसे मामले सामने आए जहां अनाथ आश्रम में रहने वाले बच्चों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है, उन्हें लाठी-डंडों से मारा जाता है, खाने के लिए खाना नहीं दिया जाता। इससे अधिकतर बच्चो में कुपोषण के कारण कई बीमारियों ने जन्म लिया है और इन बच्चों के देखभाल की भी जिम्मेदारी वहां के अधिकारी सही से नहीं निभा रहे हैं। लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ सरकार को सख्त कदम उठाने चाहिए, ताकि उन मासूम बच्चों की भी जिंदगी संवर पाए।

हालांकि ऐसे मामले हमारे देश मे अनगिनत हैं, लेकिन जिन बच्चों को उनका धर्म, जाति देश भी तक नहीं पता, जिन्हें शायद सरहदों के मायने भी नहीं पता होते, उन लोगों के साथ कोई इतना दुर्व्यवहार कैसे कर पाता है। हम सभी यह बात भली-भांति जानते हैं कि अनाथ आश्रमों में बच्चों की परवरिश, उनका रहन-सहन, पढ़ाई-लिखाई और स्वास्थ्य का ध्यान किस प्रकार रखा जाता है। रेलवे स्टेशन, फुटपाथ, बस अड्डों पर पाए जाने अनाथ बच्चों को जब कोई भी सहारा नहीं होता तो तब शायद स्थानीय प्रशासन उन्हें अनाथ आश्रमों में छोड़ कर चले जाते हैं। लेकिन हमारे देश में कई ऐसे शहर हैं, जहां उन अनाथ बच्चों को अपना कहने वाला कोई नहीं है।

जब उन मासूम बच्चों को अपनों की याद आती होगी तो उनके मासूम चेहरों पर आंसुओं की जैसी झड़ी लग जाती होगी। शायद वे भी सोचते होंगे कि अगर हमारे सिर पर मां-बाप का साया होता तो हमारा भी घर होता यों हमें फुटपाथ पर सोना नहीं पड़ता। पढ़ने के लिए भी स्कूल होता। परिवार का प्यार होता। होली-दीवाली जैसे त्योहार होते। मैं किसी पर बोझ नहीं होता। बस दिल में एक ही दुआ होती कि अगर मां-पिता होते तो शायद मुझे इस समाज में भीख का एहसास नहीं होता।

’निधि जैन, लोनी, गाजियाबाद

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