मुफ्त का बोझ

हमारे देश में सत्ताधारी और राजनेता आमजन को लुभाने के लिए मुफ्तखोरी का लॉलीपॉप विभिन्न योजनाओं और वादों द्वारा देते हैं।

सांकेतिक फोटो।

हमारे देश में सत्ताधारी और राजनेता आमजन को लुभाने के लिए मुफ्तखोरी का लॉलीपॉप विभिन्न योजनाओं और वादों द्वारा देते हैं। यह सही है कि गरीबों और जरूरतमंदों की भलाई के लिए सरकारों को नई-नई योजनाएं लानी चाहिए, लेकिन इन योजनाओं से देश की अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संसाधनों को कोई नुकसान तो नहीं हो रहा, इसका विश्लेषण भी जरूर करना चाहिए। पर ऐसा शायद ही होता हो। सरकारें जब बिजली और पानी मुफ्त देती हैं, तो इनके दुरुपयोग की संभावना भी बढ़ जाती है।

पानी-बिजली का दुरुपयोग प्रकृति के विरुद्ध है। बिजली तैयार करने के लिए भी ऐसे संसाधनों का प्रयोग होता है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते होंगे और पानी की बर्बादी तो बहुत बड़ी नासमझी है। हमारे देश में ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं, जहां पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता। अगर हमें अपनी भावी पीढ़ी को स्वच्छ जल और पर्यावरण देना है तो हमें प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग समझदारी से करना होगा। सरकारों को बिजली और पानी की सुविधाओं का उचित प्रयोग करना होगा, नहीं तो भविष्य में किसी भी राजनीतिक पार्टी की सरकार मुफ्त में तो क्या, पैसे देकर भी हमें पीने वाला पानी, बिजली और स्वच्छ पर्यावरण, स्वच्छ हवा उपलब्ध नहीं करवा पाएगी।

भारतीय लोकतंत्र को गतिशील बनाए रखने के लिए देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत होना भी जरूर है, और इसमें जनभागीदारी भी बहुत जरूरी है, लेकिन जब सरकारें मुफ्तखोरी की योजनाएं चला कर सरकारी खजाने पर बेवजह का बोझ डालेंगी और लोग अपना कर सरकारी खजाने में जमा कराने के कतराएंगे तो देश की अर्थव्यवस्था का पहिया कैसे गतिशील होगा?
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर
अड़ियल रुख
भारत में किसानों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। 27 सितंबर के भारत बंद से कुछ उम्मीद की किरण आती दिखी। लगा कि सरकार कुछ दबाव में अएगी, मगर सरकार ने फिर से कुछ खोखले वादों का हवाला देकर मामला कुछ दिनों के लिए टरका दिया। अभी पता नहीं कितने दिन और इन किसानों को यों ही अपने हक के लिए खुद को तपाना होगा और यों ही सड़कों पर डेरा जमाए रखना होगा। न जाने सरकार कब तक अपने अड़ियल स्वभाव को बनाए रखेगी। हालांकि अगर सरकार जिद्दी है, तो किसान भी अपने फैसले पर अडिग हैं। अगर दोनों पक्ष थोड़ा-थोड़ा झुकें तो समस्याओं का निवारण सरल हो सकता है। पर यहां तो एक सेर है तो दूसरा सवा सेर। खैर, आगे क्या होगा, यह या तो किसान जानते हैं या सरकार, लेकिन राजनीति तो दोनों ओर साफ दिख रही है।
’निशी मिश्रा, आइएमएस, नोएडा

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