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विकास की शर्त

स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’ 1789 में शुरू हुई फ्रांस की क्रांति का नारा था। यह नारा तत्कालीन नवोदित पूंजीपति वर्ग का था जो सामंतों को प्राप्त विशेषाधिकार में अपना हिस्सा मांग रहे थे। आज इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पूंजीवादी भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने नया नारा दिया है ‘सबका साथ, सबका विकास’, तो […]
Author March 13, 2015 10:34 am

स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’ 1789 में शुरू हुई फ्रांस की क्रांति का नारा था। यह नारा तत्कालीन नवोदित पूंजीपति वर्ग का था जो सामंतों को प्राप्त विशेषाधिकार में अपना हिस्सा मांग रहे थे। आज इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पूंजीवादी भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने नया नारा दिया है ‘सबका साथ, सबका विकास’, तो इसके निहितार्थ को समझने की जरूरत है।

यहां ‘सबका विकास’ का मतलब है पूंजीपति वर्ग का विकास और इस पुण्य कार्य के लिए मोदी को ‘सबका साथ’ चाहिए! मंदी के दौर में पूंजी बटोरने के लिए पहले वे ‘टपकती पूंजी’ को जन-जन तक पहुंचाने के लिए जन-धन योजना और कई लोक-लुभावन कार्यक्रम पेश कर रहे हैं ताकि भूमि अधिग्रहण जैसे कानून पर अवाम और संगठित मजदूर वर्ग (जो काफी कमजोर हो चुका है) का विरोध न झेलना पड़े। भले ही वित्तमंत्री जेटली ने बजट भाषण का समापन ‘सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया’ से किया पर बजट की सच्चाई यह है कि किसान आत्महत्या करते रहेंगे और युवा हाथों को काम नसीब नहीं होगा। इसके लिए तो एक जुदा आर्थिक सोच की जरूरत है जो इस बजट में नहीं है।

कुल मिला कर यह कहना समीचीन होगा कि विदेशी पूंजी के सामने नतमस्तक होने के मामले में भाजपा और कांग्रेस के बीच कोई फर्क नहीं है। गौरतलब है कि भारतीय पूंजीवाद का विकास शास्त्रीय ढंग से नहीं हुआ है जैसा कि इटली (जिसे पहला पूंजीवादी राज्य होने का गौरव प्राप्त है), ब्रिटेन आदि यूरोपीय देशों में हुआ। इसने अपना ऐतिहासिक कार्य पूरा किए बगैर भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से जुड़ कर विगत दो-ढाई दशकों में पूंजी के असमान वितरण और वित्तीय पूंजी के बढ़ते प्रभाव के कारण तमाम तरह की सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों को जन्म दिया है मानो देश में प्रच्छनत: आंतरिक उपनिवेश पनप रहा हो!

हालांकि सेवा क्षेत्र (55 फीसद), कृषि (17 फीसद) और उद्योग (28 फीसद) दोनों से बड़ा हो चुका है फिर भी तकरीबन साठ फीसद जनता की आर्थिकी खेती से जुड़ी है। ऐसे में ‘आप’ और ‘हम’ जैसों से काम नहीं चलने वाला। जनवाद और जनवादी राजनीति से जुड़े देश भर के हजारों संगठनों के प्रणेताओं को समझना होगा कि पूंजीवादी व्यवस्था में हरेक मुद्दे पर अलग-अलग आंदोलनों से कोई बात नहीं बनने वाली है। इसके पर्याप्त उदाहरण हमारे सामने हैं।

हमें एकजुट होकर ऐसी आर्थिकी के लिए धैर्यपूर्वक संघर्ष करना होगा जो वर्तमान पूंजीवादी लोकतंत्र की जगह उस लोकतांत्रिक भारत को सुनिश्चित करे जहां सबके स्वतंत्र विकास की पूर्व शर्त प्रत्येक का स्वतंत्र विकास हो।

 

रोहित रमण, पटना विवि, पटना

 

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