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चौपाल: स्त्री का श्रम

देश की आधी आबादी बिना रोजगार के जीवन-यापन कर रही और घर में रह रही महिलाओं के रोजगार के बारे में जिक्र आता है तो उनके कॉलम में गृहिणी लिखा जाता है। इसका अर्थ यह लगाया जाता है कि वे घर में बैठी रहती हैं कोई काम नहीं करती हैं। खाना पीना बनाती हैं, बच्चे का देखभाल करती हैं। उनके द्वारा किए जा रहे समस्त कार्यों का मूल्यांकन सही तरीके से नहीं किया जाता है।

Author Updated: November 4, 2020 5:38 AM
रोजी रोटी के लिए संघर्ष करतीं महिलाएं। फाइल फोटो।

देश की आधी आबादी बिना रोजगार के जीवन-यापन कर रही और घर में रह रही महिलाओं के रोजगार के बारे में जिक्र आता है तो उनके कॉलम में गृहिणी लिखा जाता है। इसका अर्थ यह लगाया जाता है कि वे घर में बैठी रहती हैं कोई काम नहीं करती हैं। खाना पीना बनाती हैं, बच्चे का देखभाल करती हैं। उनके द्वारा किए जा रहे समस्त कार्यों का मूल्यांकन सही तरीके से नहीं किया जाता है।

जबकि नजरिया बदल कर देखा जाए तो वे घर के बाहर जाकर नौकरी नहीं भी कर रही हों तो परिवार को संभाले रखने के एक बहुत ही मजबूत आधार स्तंभ के रूप में वे खड़ी रहती हैं। काम करती हैं। घर की साफ-सफाई के साथ-साथ स्वस्थ ताजा खाना-पीना बनाना, परिवार की देखभाल करने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य वे करती हैं। बच्चों की पढ़ाई के खातिर वे अपने शौक को तिलांजलि दे देती हैं।

इन सबों का बाजार भाव के मुताबिक मूल्य आंका जाए तो जो महिलाएं या पुरुष बाहर जाकर कुछ कमा कर लाते हैं, उनसे कहीं अधिक मूल्य का काम वे करती हैं। लेकिन उन्हें पुरुषों के बराबर सम्मान नहीं मिलता। घर में बैठी महिलाओं के कामकाज का भी आकलन शून्य की दृष्टि से कतई नहीं किया जाना चाहिए और इस संदर्भ में परिवार के लोगों को तो घर की महिलाओं का सम्मान और जरूरतों को पूरा करना ही चाहिए।

इनके साथ साथ सरकारी स्तर पर गृहिणी के रूप में घर-परिवार जैसी महत्त्वपूर्ण संस्था का निर्वाह कर रही महिलाओं के लिए कुछ न कुछ न्यूनतम मेहनताना देने का व्यवस्था जरूर करनी चाहिए, क्योंकि आर्थिक युग में आर्थिक नजरिए से वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण अर्थ को संभालने के बावजूद उनके हाथ में शून्य ही आता है। महिलाओं के लिए भी यह जरूरी है कि वे घरों की दहलीज में सिमटे रहने के बजाय बाहर की दुनिया चुनें, घूमने के लिए और काम करने के लिए भी। विचार का संपर्क ही असली सशक्तिकरण होता है और विचार बाहर की दुनिया में ही विचरण करता है।

’मिथिलेश कुमार भागलपुर, बिहार

भुखमरी की राह

‘महंगाई की मार’ (संपादकीय, 3 नवंबर) पढ़ा। हम हर साल प्याज के दामों में कुछ समय के लिए बेतहाशा वृद्धि देखते हैं, लेकिन सरकार छापेमारी कर जमाखोरों को पकड़ती है, देश में स्टॉक कम होने पर निर्यात पर रोक लगा दिया जाता है और आयात को प्रोत्साहित किया जाता है। मगर वर्तमान सरकार ने नए कृषि कानून के माध्यम से जमाखोरी को वैध बना दिया, जिसकी वजह से प्याज और आलू समेत अनेक खाद्य पदार्थों के मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि हुई है

। इसकी वजह से प्याज के दामों में भी वृद्धि हुई थी, लेकिन आनन-फानन में सरकार ने जमाखोरी की अधिकतम सीमा दो टन तय किया। सवाल है कि आलू की कीमत पिछले ग्यारह सालों के उच्चतम स्तर पर है, मगर क्या इसका लाभ किसानों को मिल रहा है? इसका उत्तर है, छोटे किसानों को बिल्कुल नहीं, क्योंकि वे न तो कोल्ड स्टोरेज यानी शीत भंडारों में आलू रखने में सक्षम है और न ही बाजार के जोखिम उठाने के लिए सशक्त। और भारत में नब्बे फीसद किसान छोटे और सीमांत किसान हैं। इसका एकमात्र फायदा बड़े किसानों और उद्योगपतियों को हो रहा है।

राज्य का कर्त्तव्य होता है सभी के हितों की रक्षा करना और समाज में सामंजस्य स्थापित करना, लेकिन सरकार की अदूरदर्शिता आम जनता, विशेषकर गरीबों और कमजोर वर्गों के लिए विपत्ति साबित हो रही है । आलू, प्याज, टमाटर भारतीय समाज में आधारभूत आवश्यकताएं हैं और इसके मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि देश में भुखमरी को बढ़ाएगा। वैश्विक स्तर पर भुखमरी सूचकांक में हमारे देश की क्या हालत है, यह जगजाहिर है।
’गंगाधर तिवारी, लखनऊ, उप

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