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चौपाल: बाद के सवाल

कई बार आशंकाएं सही साबित हो जाती हैं। बहत्तरवें गणतंत्र दिवस के मौके पर एक तरफ वीर जवानों की टुकड़ियां अपना शौर्य प्रदर्शन कर रही थीं, तो दूसरी ओर देश के अन्नदाता भी अपने आंदोलन के रास्ते पर आगे बढ़े जा रहे थे।

Updated: January 29, 2021 11:06 AM
अपनी मांगों को लेकर रैली में भाग लेने जाते किसान। फाइल फोटो।

पिछले दो महीने से सर्द ठंड में आंदोलन कर रहे किसानों का हिम्मत जवाब दे गया हो शायद! लेकिन यह न तो आंदोलन के लिए ठीक हुआ और न देश के लिए। लेकिन इस हिंसा के बाद कुछ सवाल उपजे हैं। सबसे पहले तो सवालों के घेरे में पुलिस आती है।

ऐसे घटनाओं के समय पुलिस मूकदर्शक क्यों बन जाती है? दरअसल राजनीति से निर्देशित होने वाली व्यवस्था को कुछ खास लोगों की चिंता तो रहती है, लेकिन देश की संपत्ति, देश में रहने वाले आम लोगों की चिंता नहीं होती। फिर क्या किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले समूह को इस आशंका को लेकर पहले से सचेत नहीं रहना चाहिए था?

यह सवाल भी बनता है कि इस अफसोसनाक घटना के बाद क्या होगा! लालकिला की घटना के बाद जिस शख्स और बाकी लोगों के नाम और वीडियो सामने आए हैं और जिसे जिम्मेदार बताया जा रहा है, क्या उन पर कार्रवाई होगी? या फिर अहिंसा के रास्ते पर चल कर आजादी दिलाने वाले गांधी को गाली देने वाली किसी साध्वी के तरह वे भी माननीय बना दिए जाएंगे!

जम्मू-कश्मीर में पकड़े गए डीएसपी देविंदर सिंह और चिन्मयानंद आदि की तरह उन्हें भी सख्त कार्रवाई से दूर ही रखा जाएगा! आज भी जेएनयू में नारा लगाने वाले तथा हिंसा करने वाले नकाबपोशों को सरकार पहचान नहीं पाई है। अगर ऐसे ही सरकार और सरकारी तंत्र काम करते रहे तो आम लोगों को सरकार की एजेंसियों से उम्मीदें भी जाती रहेंगी।

दिल्ली में जो कुछ हुआ, अगर इसके लिए किसान संगठन दोषी हैं तो सरकारी तंत्र भी उतना ही दोषी है जो कानून को केवल अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करते हैं।
’अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय, बिहार

बोली का जीवन

कुछ बोलियां ऐसी हैं, जिनके बोलने वाले कुछ लोग अक्सर बोली में अपशब्दों का प्रयोग तकिया कलाम के रूप में करते हैं, चाहे वे जानवरों के लिए या फिर लोगों के लिए बोली गई हो। ये बोली में समाए अपशब्द गुस्से के समय या बराबरी के लोगों या आपसी बैरभाव निकालते समय जाहिर किए जाते हैं। ऐसा बोलने वाले इस पर जरा भी गौर नहीं करते कि बच्चों पर इसका असर कितना और कैसा होगा। बोली में स्वयं विकृति पैदा करके शुद्धता नहीं लाएंगे तो बोली में विकृति पैदा होकर वह विलुप्ति की ओर अपने आप चली जाएगी। ऐसे में बोली का सम्मान करने वालों का प्रतिशत बहुत कम रह जाएगा। इसका सांस्कृतिक नुकसान होगा, सो अलग।

एक ओर कुछ ही लोग हैं, जो बोली के सम्मान के लिए आगे आते हैं। वे इस दिशा में गीत, कहानी, लघु कथा, हायकू, दोहा, कविता आदि पर केंद्रित कार्यक्रम आयोजित कर और लेखकों की कृतियों का विमोचन कर प्रचार-प्रसार में लगे रहते हैं। ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। जब तक बोली में शुद्धता और सम्मान का समावेश नहीं रहेगा, तब तक भाषाओं के आश्रय से स्वयं को दूर नहीं कर पाएंगे और भाषाओं का सही आधार भी नहीं मजबूत बनेगा। कड़ियां एक दूसरे से जुड़ी हुई हैैं।

शुद्ध भाषा के अस्तित्व को अंग्रेजी के मिश्रण से हम भुगत ही रहे हैं। हमें गर्व महसूस होता है कि हम अंग्रेजी भाषा का समावेश अपनी मातृभाषा में करने लगे हैं। लेकिन यह एक भटकाव है। हम अपशब्दों से मुक्त बोली और भाषा लिखने, बोलने, पढ़ने के प्रयोग का संकल्प लें, ताकि भावी पीढ़ियों को भी हमारे द्वारा बोली-भाषा कोयल की कूक-सी बोलने पर मीठी लगे। साथ ही बच्चों और बड़ों को भी साहित्य के सही आधार की समझ हो सके।
’संजय वर्मा ‘दृष्टि’,
मनावर, धार, मप्र

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