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चौपाल: सबकी जिम्मेदारी

यकीनन हम विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए अपने अपने कर्म को वरीयता देते हैं। लेकिन शासन-प्रशासन के साथ-साथ हमारी भी यह जिम्मेदारी है कि सुशासन की स्थापना के लिए हम अपने स्तर पर अपनी भी जिम्मेदारी का निर्वहन करें।

Author Published on: July 1, 2020 4:15 AM
Chinese, ladakh, LACचीन की तरफ से सीमा संधि का प्रत्यक्ष उल्लंघन किया गया है, लेकिन चीन अपनी नीतियों के अनुसार हेकड़ी दिखा रहा है।

घटना विशेष के घटित हो जाने के बाद उसकी पुनरावृत्ति न हो, इस संदर्भ में विशेष प्रयास किए जाने की नितांत आवश्यकता है। समय-समय पर सुर्खियां बनती तमाम घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में उसके दोहराव को कारगर तरीके से रोकना अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा कालांतर में राजनीतिक तथा सामाजिक विकृतियों का सैलाब हमारी गौरवशाली संस्कृति को तार-तार कर सकता है। राजनीतिक सक्रियता भी लाभ-हानि के गणित पर निर्भर हो जाना निश्चित ही गंभीर चिंता का विषय है।

यकीनन हम विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए अपने अपने कर्म को वरीयता देते हैं। लेकिन शासन-प्रशासन के साथ-साथ हमारी भी यह जिम्मेदारी है कि सुशासन की स्थापना के लिए हम अपने स्तर पर अपनी भी जिम्मेदारी का निर्वहन करें। इस दिशा में राजनीतिक इच्छाशक्ति का जागृत हो जाना निश्चित ही अपेक्षित परिणाम दे सकता है।

शासन-प्रशासन के साथ-साथ नागरिकों की संवेदनशील मनोवृत्ति को और अधिक विकसित करने की दिशा में सम्मिलित प्रयास अवश्य किए जाना चाहिए। बेहतर हो अगर राजनीतिक तथा सामाजिक नेतृत्व इस दिशा में अपनी जिम्मेदारियों को भली-भांति समझ कर स्वस्थ समाज की संरचना के सूत्रधार बने।

अक्सर देखा गया है कि विषम परिस्थितियां निर्मित हो जाने के बाद विभिन्न राजनीतिक दल ‘राजनीतिक लाभ’ का विचार कर अपनी भूमिका सुनिश्चित किया करते हैं। ऐसे में विकृतियों का निदान तो नहीं होता, लेकिन कोई भी अमानवीय मामला तुच्छ राजनीति की भेंट चढ़ जाता है। सामाजिक जनजीवन को ऐसी राजनीतिक नकारात्मकता की भारी कीमत चुकाने को बाध्य होना पड़ता है।

राजनीतिक हर घटना-दुर्घटना में राजनीति न करें और सामाजिक नेतृत्व, सामाजिक विकृतियों का त्वरित समाधान करने के प्रति तत्पर रहे। दरअसल, राजनीतिक तथा सामाजिक परिवेश में शुचिता और पवित्रता को स्थापित करने की दिशा में हमारी जिम्मेदारी भी कोई कम नहीं है।

समय आ गया है कि हम परस्पर दोषारोपण की मनोवृत्ति से बचें और अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को समझ कर अपने राजनीतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व को निभाने की दिशा में आगे आएं। ऐसा होने पर ही हम विकसित भारत की परिकल्पना को सच्चे अर्थों में साकार सिद्ध कर सकते हैं।
’अरविंद पाराशर, फतेहपुर, उप्र

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