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जरूरी खेल

इस आधुनिकता के दौर में युवा अपने आप को निरंतर शारीरिक सक्रियता और क्रियाओं से दूर करते जा रहे हैं।

sportsसेहत के लिए खेल जरूरी। फाइल फोटो।

इस आधुनिकता के दौर में युवा अपने आप को निरंतर शारीरिक सक्रियता और क्रियाओं से दूर करते जा रहे हैं। उन क्रियाओं में से मैदानी खेल एक ऐसा साधन होता है, जो मनुष्य के सर्वांगीण विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जहां एक समय मनोरंजन का प्रमुख साधन खेल हुआ करता था, अब वही स्थान इंटरनेट से जुड़े हुए अत्याधुनिक उपकरणों ने ले लिया है।

युवाओं का खेल से दूर होने का प्रमुख कारण एक तरफ स्मार्टफोन, वर्चुअल आॅनलाइन गेम की दुनिया और सोशल मीडिया है, तो दूसरी तरफ विद्यालय और अभिवावकों द्वारा बच्चों पर पढ़ाई का दबाव डाल कर उनके प्रतिदिन की दिनचर्या से शारिरिक खेल को बेहद कम कर दिया गया है। खेल न सिर्फ शारीरिक स्फूर्ति प्रदान करता है, बल्कि आज की दुनिया में सबसे तेजी से उभरती बीमारी मानसिक तनाव को भी दूर करता है।

इससे न सिर्फ हमको मानसिक मजबूती मिलती है, बल्कि हमारे अंदर निर्णय लेने की क्षमता के साथ-साथ ध्यान केंद्रित करने की भी क्षमता का विकास होता है। जिस तरह किसी वृक्ष के विकास के लिए उसके जड़ों का फैलना आवश्यक है, उसी तरह शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तित्व के विकास के लिए शिक्षा रूपी जड़ के साथ-साथ खेल रूपी जड़ का भी फैलना अति आवश्यक है।

इसलिए हम लोगों को अपने दैनिक जीवन में खेल को जरूर जोड़ना चाहिए। वह कोई भी मैदानी खेल हो सकता है। इस शुरुआत के लिए अभिवावकों और विद्यालयों को भी जरूर आगे आना चाहिए और युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिए खेल को नियमित रूप से अपने दिनचर्या में शामिल करने का प्रयास करना चाहिए।
’शिवम पांडेय इविवि, प्रयागराज, उप्र

संस्कृति के नाम पर

हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कहा कि औरतों के घुटने के पास फटी जींस पहने देख कर हैरानी होती है। उनके इस बयान पर विपक्षी राजनीतिक दलों, महिला संगठनों तथा आम लोगों ने भी आपत्ति जताई है। स्वतंत्र भारत और एक सभ्य समाज में किसे क्या पहनना है, क्या खाना है, इसकी आजादी होती है। लेकिन एक राज्य के नेता के मुख से महिलाओं के प्रति इस तरह की अभद्र टिप्पणी कहीं से भी शोभा नहीं देती है।

यों किसी भी राजनेता द्वारा महिलाओं को उसके कपड़ों से आंकना ठीक नहीं है, बल्कि हमें स्वयं में बदलाव लाने की जरूरत है। इक्कीसवीं सदी में महिलाएं चारदिवारी को पार कर चांद पर कदम रख चुकी हैं। हमें संकीर्ण मानसिकता से आगे निकलकर संस्कृति के पाठ कपड़ों में नहीं ढूंढ़ने चाहिए, बल्कि शैक्षणिक योग्यता, विज्ञान, तकनीक, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में महिलाओं को बढ़ावा देकर नई संस्कृति लाने की जरूरत है।
’नितेश कुमार सिन्हा, मोतिहारी, बिहार

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