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चौपालः उम्मीदों का बोझ

आज परीक्षा परिणाम न केवल बच्चों, बल्कि उनके अभिभावकों के लिए भी चिंता का विषय है। अपेक्षित परिणाम न आने पर छोटे-छोटे बच्चों के चेहरे मुरझा जाते हैं।

Author May 17, 2018 5:10 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

आज परीक्षा परिणाम न केवल बच्चों, बल्कि उनके अभिभावकों के लिए भी चिंता का विषय है। अपेक्षित परिणाम न आने पर छोटे-छोटे बच्चों के चेहरे मुरझा जाते हैं। हम यह क्यों नहीं समझते कि शिक्षा का क्षेत्र कोरा व्यापार बन कर रह गया है। बच्चों को रेस का घोड़ा बना लिया गया है और उन्हें चाबुक मार कर भगाया जाता है। नतीजतन, बच्चे पढ़ाई के बोझ तले दबे नजर आते हैं। बचपन छिन गया है उनका। उन पर दुनिया भर की आकांक्षाओं का बोझ मां-बाप ही डाल देंगे तो वे मासूम जाएंगे कहां?

अकसर अभिभावक आपस में बातचीत करते नजर आएंगे कि हमारा बच्चा तो नब्बे प्रतिशत से कम लाता ही नहीं है। ऐसे में उन अभिभावकों का क्या जिनके बच्चे औसत दरजे केहोते हैं! आज के समय में जीना दूभर हो जाता है उन बच्चों का। सबके ताने सुनने पड़ते हैं, सबकी उम्मीदों का बोझ ढोना पड़ता है। हम क्यों भूल जाते हैं कि हर बच्चा तो कक्षा में प्रथम आ नहीं सकता।

क्या किसी के कहने पर गुलाब का फूल गैंदे का फूल बन जाएगा? नहीं ना, फिर क्यों बच्चों को वह बनाने की कोशिश की जाती है, जो वे नहीं होते। जिन अभिभावकों के बच्चे पढ़ाई में औसत होते हैं उन्हें उनके भविष्य की बड़ी चिंता होती है। वे क्या करेंगे क्या नहीं! मगर सच तो यह है कि जिनमें प्रतिभा है वे खुद अपनी राह खोज लेंगे।

परीक्षा परिणाम के समय बच्चे खुद बहुत तनाव में रहते हैं लिहाजा, सभी अभिभावकों से अनुरोध है कि उनका तनाव बढ़ाने की बजाय उनके साथ मजबूत ढाल बन कर खड़े रहें। क्या हुआ अगर नंबर कम आ गए, नंबर ही इंसान की प्रतिभा नहीं बताते हैं। बच्चों पर अपनी उम्मीदों का बोझ न थोपें। कम नंबर लाएं तो भी उन्हें गले लगाएं और बताए कि आप हमेशा उनके साथ हैं। आपका बच्चा पढ़ाई में औसत है तो क्या हुआ! याद रखिए वह आपके लिए खास था, खास है और खास रहेगा।

शिल्पा जैन सुराणा, वारंगल

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