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झांकियों का पर्व

गणतंत्र दिवस झांकियों का एक अनोखा पर्व है।

सांकेतिक फोटो।

गणतंत्र दिवस झांकियों का एक अनोखा पर्व है। हमारा पर्व प्रत्येक वर्ष कुछ न कुछ नया लेकर आता है। नई चीजों का आविर्भाव होता है लोगों के मन में नया अलख जगता है। नई चेतना का सूत्रपात होता है। गणतंत्र दिवस के दिन अबकी बार पहले से कहीं अलग और कुछ नया दृश्य देखने को मिल सकता है, क्योंकि सीमित समय और इस संक्रमण के दौरान परेड में बदलाव आया होगा। लेकिन अबकी बार कुछ खास होने की उम्मीद की जा सकती है जो पहले कभी नहीं देखने को मिला था।

हमारे तीनों सेनाएं अपने शौर्य का प्रदर्शन करेंगे, साथ ही राफेल, सुखोई, तेजस, जगुआर, मिग-21, जैसे योद्धा भी दुश्मनों का सीना छल्ली करने का रौद्र कूप दिखा सकते हैं। आसमान को चीरते हुए पराक्रम में चार चांद लगा सकते हैं। रंग-बिरंगी खूबसूरत झांकियां भी कदम ताल-मिलाते हुए नजर आएंगी। वास्तव में यही गणतंत्र दिवस की असली खूबसूरती होती है, जहां शौर्य के साथ-साथ पराक्रम, बंधुत्व से लेकर अनेकता में एकता जैसा संदेश दिया जाता है। ज्ञात हो कि इस वर्ष बारह राज्यों की झांकियां शामिल होने जा रही हैं।

  • समराज चौहान, कार्बी आंग्लांग, असम

डिजिटल विभाजन

हाल में पुरुषों के अनुपात में महिलाओं की संख्या को लेकर काफी उत्साह देखा गया। लेकिन सच यह है कि भारत को लड़कियों को आगे बढ़ाने की दिशा में अभी बहुत कुछ करना है। कोविड के दौरान डिजिटल विभाजन के कारण कई लड़कियां लड़कों के मुकाबले पढ़ाई में पीछे रह गई हैं। आर्थिक तंगी के कारण कई की पढ़ाई बिल्कुल छूट गई, कुछ का जल्दी ब्याह कर माता पिता ने अपनी ‘जिम्मेवारी’ से मुक्त हुए। देश में जहां महिला सशक्तिकरण को लेकर सरकार द्वारा कई कदम उठाए जा रहे हैं, जिसके तहत लड़कियों के आगे बढ़ने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन समाज की लड़कियों को लेकर रूढ़िवादी सोच अभी खत्म नहीं हुई है।

आज भी लड़की के जन्म से ही माता-पिता को उसके विवाह के खर्च और दहेज की फिक्र सताती है। आज भी लड़की को आजीविका विकल्प चुनने के समय उसकी भविष्य की जिम्मेवारियां याद करवाई जाती हैं। आज भी मनोरंजन उद्योग महिलाओं को अभद्र तरीके से पेश करता है। आज भी महिलाएं घरों में और घर के बाहर लैंगिक भेदभाव का शिकार हैं।

  • डिंपी भाटिया, नई दिल्ली

दंभ की राजनीति

आजकल राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक चिह्नों को भी दलगत राजनीति के चश्मे से देखने की जो नई प्रवृत्ति देखने में आ रही है, वह लोकतंत्र के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है। इस प्रवृत्ति में यह दंभ छिपा हुआ है कि केवल एक ही दल देश के गौरव की रक्षा करने में समर्थ है। हाल ही में अमर जवान ज्योति को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक लौ में विलीन करने को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

अमर जवान ज्योति 1971 के युद्ध में भारत की विजय का प्रतीक थी और उसका श्रेय दिवंगत इंदिरा गांधी को दिया जाता है। दिवंगत अटल बिहारी वाजपेई ने तो उस समय उन्हें दुर्गा का अवतार की संज्ञा दी थी। आजकल कुछ नेताओं के एक दल के होते हुए भी दोनों की सोच में जमीन-आसमान का फर्क पाया जाता है। जब सोच ही इतनी संकीर्ण है तो फिर सबका साथ सबका विकास कैसे संभव है?

  • नवीन थिरानी, नोहर, राजस्थान

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