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चौपालः नीयत में खोट

किंगफिशर के मालिक विजय माल्या सत्रह बैंकों के नौ हजार करोड़ रुपए के कर्जदार हैं और अपने विरुद्ध कानून का शिकंजा कसते देख देश छोड़ कर निकल गए हैं।
Author March 16, 2016 04:04 am
विजय माल्या

किंगफिशर के मालिक विजय माल्या सत्रह बैंकों के नौ हजार करोड़ रुपए के कर्जदार हैं और अपने विरुद्ध कानून का शिकंजा कसते देख देश छोड़ कर निकल गए हैं। लंदन में किसी गुप्त स्थान से ट्वीट करके खुद को अंतरराष्ट्रीय व्यवसायी बता कर व्यवसाय के सिलसिले में भारत से बाहर जाते रहने की बात कहते हुए वे अपने विदेश गमन को सही ठहराने की कोशिश के साथ अभी भारत लौटने के लिए उचित अवसर न होने का हवाला दे रहे हैं। यदि उनका भरोसा भारत के संविधान और कानूनी प्रक्रियाओं में है तो देश छोड़ कर भागे क्यों हैं? नीयत में खोट नहीं है तो क्यों अज्ञातवास से ट्वीट कर रहे हैं? मीडिया का सामना करने से क्यों कतरा रहे है? मीडियाकर्मियों को ब्लैकमेल की धमकियां क्यों दे रहे हैं?
अपनी अय्याशी और अर्धनग्न बालाओं वाले कैलेंडरों की चर्चाओं के बीच ही माल्या राज्यसभा सदस्यता प्राप्त कर लेते हैं, इससे बड़े विस्मय की बात क्या हो सकती है!

देश के सामने सवाल है कि माल्या जैसे लोग किस तरह इतना कर्ज ले लेते हैं? कैसे देश छोड़ कर भाग जाते हैं? कौन उनके मददगार हैं? जबकि लघु उद्यमियों, व्यवसाइयों, किसानों, छात्रों, श्रमिकों, शासकीय योजनाओं के हितग्राहियों के लिए छोटी-छोटी साख सुविधाएं प्राप्त करना भी मुश्किल होता है। इन छोटे-छोटे ऋणों की वसूली के लिए निजी एजेंसियों से लेकर सरकारी एजेंसियों की मदद ली जाती है, गैरकानूनी तरीकों से डराया-धमकाया और अपमानित किया जाता है, जिससे वे इधर-उधर पलायन करने और कोई विकल्प न सूझने पर हताशा में आत्महत्या जैसे कदम भी उठाते हैं। ऐसे कदमों पर दीगर कारणों जैसे नपुंसकता, पारिवारिक आदि से आत्महत्या के बेशर्मी भरे बयान भी जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के सुने गए हैं।

बैंक की अनुत्पादक आस्तियों में नब्बे प्रतिशत हिस्सा बड़े औद्योगिक घरानों का है, समझौतों के माध्यम से मूल और ब्याज में छूट, अपलिखित करना, बट्टाकृत करने में भी बड़ा हिस्सा इन्हीं का होता है पर बदनाम शासकीय योजनाओं के हितग्राहियों और छोटे ऋणियों को किया जाता है। छोटे ऋणियों और शासकीय योजनाओं के जिन हितग्राहियों को समझौते, अपलिखित और बट्टाकृत किया जाता है वे जानबूझ कर चूककर्ता नहीं हैं, उनके सामान और उत्पाद के विपणन की वास्तविक समस्याएं होती हैं।

देश के बैंकों में जमा धनराशि करोड़ों करोड़ लोगों की गाढ़ी कमाई की राशि है जिसमें सिर्फ एक लाख रुपए तक की गारंटी डिपोजिट इंश्योरेंस और क्रेडिट गारंटी कापोर्रेशन की होती है, लिहाजा देश की जनता को श्वेत पत्र के जरिए बताया जाना चाहिए कि नई आर्थिक नीतियों के दौर में कितनी राशि समझौतों के तहत माफ की गई, कितनी अपलिखित की गई और कितनी बट्टाकृत की गई? छूट की इस लूट का कितना हिस्सा किन-किन कारपोरेट घरानों को मिला है और उन्हें फिर से कितना-कितना कर्ज दिया गया है, यह भी बताना चाहिए।

तमाम उथल-पुथल में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रति देश की जनता का विश्वास बना रहा है और वैश्विक मंदी के दौर में आर्थिक व्यवस्था को अक्षुण्ण रखने और आधारभूत ढांचे के विकास के लिए उपलब्ध कराए गए अकूत संसाधनों के योगदान के मद्देनजर इन्हें और सुदृढ़ बनाए रखने के लिए ऋण वसूली के लिए प्रभावी नीतियां बनाने, जानबूझ कर चूककर्ता को अपराधी घोषित कर दंड देने, चुनाव लड़ने और लाभ के पद प्राप्तकरने पर प्रतिबंध लगाने और पद पर हो तो तत्काल हटाने की कार्रवाई की जानी चाहिए।
’सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

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