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किसान की सुध

सरकार ग्रामीणों के लिए अनेक योजनाएं चलाती है लेकिन वे कागजों तक सीमित होती है।
Author नई दिल्ली | May 11, 2016 01:55 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

गांधीजी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है लेकिन रोजगार की तलाश में किसान लगातार गांवों से विस्थापित हो रहे हैं। गांवों में बढ़ती समस्याओं के कारण अब किसान शहरों की ओर रुख करने लगे हैं। सोचने का विषय है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? आजादी के समय करीब सत्तर फीसद आबादी गांवों में निवास करती थी लेकिन अब यह आंकड़ा घट कर पचास फीसद से भी नीचे चला गया है और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की संख्या में निरंतर कमी देखने को मिल रही है। सरकारों से जब इस समस्या के लिए जिम्मेदार लोगों के बारे में जवाब मांगा जाता है तो जिम्मेदारियों को दूसरों पर थोप दिया जाता है। गांवों का मुख्य व्यवसाय खेती हुआ करता था जिससे किसान की सभी जरूरतों की पूर्ति के साथ ही सुखपूर्वक जीवन यापन हो जाता था। आधुनिक दौर में किसानों की आवश्यकताओं में तो भारी बढ़ोतरी हुई है लेकिन कृषि घाटे का सौदा हो गई है।

यह सच है कि समय के साथ बदलाव होता है और किसानों के जीवन में भी बदलाव हुए मगर उनके मुख्य रोजगार कृषि में नकारात्मक बदलाव देखने को मिला। कृषि की समस्याओं को देखते हुए आज कोई भी किसान नहीं चाहता कि उसके बेटे या बेटियां किसान बनें। इसलिए वह उन्हें पढ़ाना चाहता है और पढ़ा-लिखा प्रत्येक युवा चाहता है कि उसे रोजगार मिले। गांवों में अच्छी शिक्षा और रोजगार के अभाव के चलते ही लोग शहरों की ओर रुख करते हैं। लेकिन हमारे नेता कभी इन समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देते, बस उन लोगों का चुनाव के लिए इस्तेमाल करते हैं और फिर पांच साल के लिए भूल जाते हैं। कभी भी उनसे यह जानने का प्रयास नहीं किया जाता कि आखिर किन मजबूरियों के चलते उन्होंने अपने गांव से किनारा कर लिया है।

सरकार ग्रामीणों के लिए अनेक योजनाएं चलाती है लेकिन वे कागजों तक सीमित होती है। अगर किसी योजना को पचास फीसद भी लागू किया जाता तो विस्थापन में कुछ कमी आती मगर ऐसा होता नहीं दिख रहा, बल्कि यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। गांवों से शहरों में आए लोगों के लिए यहां भी रोजगार पाना इतना आसान नहीं है। हाथ में टिफिन लिए वे चौराहों पर रोजगार के लिए जद्दोजहद करते हैं। परिवार का पेट पालने के लिए मजबूरन उनके बच्चों और पत्नी को भी काम करना पड़ता है। आज सरकार के गलत निर्णयों के कारण स्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं। जो अन्नदाता देश के लिए अनाज पैदा करता था आज वह रोजगार की तलाश में चौराहों पर नजर आता है। (श्याम शर्मा बामनवास, जयपुर)
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मानसिक बेड़ियां
भारतीय समाज की पुरुषवादी मानसिकता झकझोर देने वाली है। बात उस दिन की है जब दुनिया मातृ दिवस मना रही थी। एक परिचित ने मुझे अपने घर खाने पर बुलाया और वार्तालाप के दौरान उसने कहा कि आज वही व्यक्ति सफल है जिसके बच्चे सफल हैं (विशेषकर पुत्र)। चूंकि अभी तक मैं विवाहित तो थी लेकिन मेरे पास बच्चे नहीं हैं क्योंकि मैं प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी में जुटी हुई हूं। मेरी अपने मां-बाप के सपने पूरे करने की ललक और खुद का ख्वाब इस बात को पचा नहीं सका कि- ‘कोई कुछ भी बन जाए अगर बच्चे नहीं होते तो कुल अथवा वंश आगे नहीं बढ़ता।’

यह बात सुनते ही मैं तपाक से बोल बैठी- ‘हम भी तो किसी के घर के दीपक हैं, उन्हें भी हम पर नाज है, हमसे बहुत उम्मीद है।’ इतना कहते ही पिता को याद करते हुए मेरा गला रुंध गया और विषय बदलते हुए अन्य मुद्दों पर बात करने लगी। यह कैसा समाज है जो महिलाओं की तरक्की, पदोन्नति को स्वीकार नहीं करता? पुरुष, महिलाओं को सिर्फ संतान उत्पत्ति का एक साधन मात्र समझते हैं, जिससे उनके कुलदीपक का जन्म होगा। उसके बाद उनकी कोई महत्ता नहीं समझी जाती जबकि आज की नारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए हर क्षेत्र में कदम आगे की तरफ बढ़ाते हुए आसमान की बुलंदियां छूना चाहती है। अगर इस कार्य में पुरुष उन्हें थोड़ा सहयोग करें और उनके सहयोग को समझें तो समाज में आगे से ऐसे प्रश्न कोई किसी के समक्ष प्रस्तुत नहीं करेगा। (शशि प्रभा, वायु सेना स्टेशन, आगरा)
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सोचने की जरूरत
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एक बड़े शहर फरीदाबाद में रोटी जुटा सकने में असमर्थ एक मां ने अपनी तीन बच्चियों के साथ खुदकुशी कर ली। जिस शहर में देश भर से लोग रोटी कमाने आते हों वहां रोटी के अभाव में चार लोगों की जान जाना समूची व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है। दोष हमारा भी है। किसी ‘सेलिब्रेटी’ के साथ हुई दुर्घटना पर हम हफ्तों माथापच्ची करते हैं, जैसा हाल में प्रत्यूषा बनर्जी मामले में किया। मगर ऐसा ही कुछ आम आदमी के साथ हो जाए तब थोड़ी-बहुत सहानुभूति के अलावा हम कारणों पर विचार करना जरूरी नहीं समझते।

गौरतलब है कि खुदकुशी करने वाली महिला एक कोठी में सफाई का काम करती थी और पति के मरने के बाद से गहरे अवसाद में थी। यही नहीं, उसने शादी भी अपने घरवालों की मर्जी के विरुद्ध की थी। अब कई प्रश्न खड़े होते हैं- केवल अपनी मर्जी से शादी कर लेने के ‘जुर्म’ में परिवार अब भी अपनी बेटियों को क्यों हमेशा के लिए त्याग देते हैं? बड़ी-बड़ी कोठियों में खटने वालों को क्या इतने पैसे भी नहीं मिल पाते कि उन्हें दो जून की रोटी मयस्सर हो? आस-पड़ोस और समाज दुख में सहारा देने वाले माने जाते हैं मगर इन सबके रहते वह महिला इतने गहरे अवसाद में कैसे चली गई? सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाएं कहां थीं जो किसी के दम तोड़ देने तक उसे लाभ नहीं दे सकीं? सवाल कई हैं जिन पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।
(अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली)
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नशे का जाल
देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों में नशाखोरी की लत इस तेजी से बढ़ रही है कि दस वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही ज्यादातर बच्चे विभिन्न प्रकार के नशीले और मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं। नशे के गुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं। सरकार और समाज बच्चों को नशे की लत से बचाने के जो भी उपाय कर रहे हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं। इसलिए जरूरी है कि देश के भविष्य को नशे के जाल में फंसने से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए। (शुभम साहू, होशंगाबाद)

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