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मोर्चे पर किसान

अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा जब गांव-गांव, ढाणी-ढांणी में किसानों के बीच पहुंच कर पर्चे बांटे गए, उनकी छोटी-छोटी संभाएं की गई और संघर्ष के जगे हौसले के साथ किसानों ने बढ़े बिजली के बिल न जमा कराने का संकल्प लिया।

Author February 28, 2017 6:01 AM
खेत में हल जोतता एक किसान। (फाइल फोटो)

सरकारी बिजली कम्पनियां हों या भाजपा नेतृत्ववाली घोर संवेदनहीन राज्य सरकार, बिजली की बढ़ाई गई दरों को वापस लेने को कतई तैयार नहीं थी, लेकिन अखिल भारतीय किसान सभा ने पूरे राज्य खासकर सिंचित क्षेत्र के बिजली कनेक्शन लिए किसानों के बीच पहुंच कर उन्हें लामबंद किया और प्रखर विरोध करना शुरू किया। अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा जब गांव-गांव, ढाणी-ढांणी में किसानों के बीच पहुंच कर पर्चे बांटे गए, उनकी छोटी-छोटी संभाएं की गई और संघर्ष के जगे हौसले के साथ किसानों ने बढ़े बिजली के बिल न जमा कराने का संकल्प लिया। तब भी राज्य सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था, बल्कि उनके कारिंदे इसका मजाक उड़ा रहे थे। लेकिन जब इसी जनवरी में जिलों के स्तर पर बड़ी सभाएं शुरू हुर्इं तो जनता का प्रतिरोध सैलाब बन कर सड़कों पर सामने आया। जयपुर जिले के किसान जो अब तक के किसान आंदोलनों से परे रहे थे, न केवल मुखर हुए बल्कि आंदोलन की बड़ी शुरुआत हो गई। फिर भी सरकार नहीं चेती।

लेकिन जब किसानों का प्रतिरोध बढ़ने लगा तो सरकार की बेचैनी बढ़ने लगी और उसके विधायकों की हवाइयां उड़ने लगी। खबरें आई कि ये जनप्रतिनिधि सरकार के पास गुहार लेकर गए कि कृषि कनेक्शनों पर बढ़ी हुई दरें वापस लेने के लिए सरकार कोई जुगत जल्दी बिठाए। सरकार के कारिंदे और ये जनप्रतिनिधि जो कुछ दिन पहले तक बिजली की बढ़ी दरों को वापस लेने की मांग को हास्यास्पद बता रहे थे, वही अब अपने राजनीतिक नुकसान की भरपाई में जुट गए हैं। एकाएक उन्हें किसानों की बोझ से टूटती कमर का खयाल आ रहा है!सवाल है कि ये कैसे जनप्रतिनिधि हैं! इन्हें किसान की कमर पर बोझ अब दिखाई पड़ा है। किसान तो खेती की निरंतर अनदेखी और बर्बादी से पहले से ही त्रस्त है। जब सितंबर 2016 में उस पर बढ़ी हुई बिजली दरें थोपी गई थीं, उसकी कराह और घनी हो गई थी। तब क्यों नहीं सुनी गई वह कराह? अब भी क्या उसकी बबार्दी के अन्य कारणों पर सरकार का कोई ध्यान है? निश्चय ही इसका जवाब ‘नहीं’ है। अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा आयोजित आंदोलन में किसानों ने जो भरोसा जताया, जूझारू संघर्ष का संकल्प लिया, इसी ने सरकार की बैचैनी बढ़ा दी है।
’रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

 

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