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चौपाल: किसान का दुख

पराली जलाने से वायु प्रदूषण का खतरा है, मगर सरकार ने ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया है, जिससे किसान पराली को अन्य किसी काम में प्रयोग करें। सरकार ने पराली से इथनॉल या उर्वरक बनाने की जो तरीका बताया, वह कुछ ही क्षेत्र में सीमित है और बेहद खर्चीला है।

किसानों की आर्थिक स्थिति बदहाल। फाइल फोटो।

किसान दिन-रात कठिन परिश्रम से फसल उगाता है, जिससे पूरे देश का पेट भरता है। किसानों की उपज की कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं होती। एक तरफ सरकार ने नए कृषि कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रावधानों को हटा दिया यानी अब सरकार जब चाहे एमएसपी को खत्म कर सकती है और दूसरी तरफ मौसम की मार। जब उत्पादन बहुत ही खराब हौता है या बाजार में उस फसल की कीमत लागत और कटाई से भी कम होती है और सरकार खरीदारी नहीं करती तो मजबूरी में किसानों को पराली या फिर पूरी फसल ही जलानी पड़ती है।

पराली जलाने से वायु प्रदूषण का खतरा है, मगर सरकार ने ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया है, जिससे किसान पराली को अन्य किसी काम में प्रयोग करें। सरकार ने पराली से इथनॉल या उर्वरक बनाने की जो तरीका बताया, वह कुछ ही क्षेत्र में सीमित है और बेहद खर्चीला है।

लेकिन इन सब बातों को दरकिनार करते हुए उत्तर प्रदेश की अखंड किसान हितैषी सरकार ने सहारनपुर में सोलह किसानों को पराली जलाने के आरोप में जेल भेज दिया। कोई भी कानून या नियम तभी प्रभावशाली होते हैं, जब उस समस्या से बचने के लिए व्यावहारिक तौर पर रोड मैप या योजना हो। सरकार को चाहिए कि पराली के प्रबंधन के लिए ठोस कदम उठाए। अगर पराली न जलाने से किसानों को ज्यादा लाभ होगा तो वह पराली क्यों जलाएगा?
’गंगाधर तिवारी, लखनऊ, उप्र

विकल्प की रोशनी

पटाखों के फटने से प्रदूषण होता है और आतिशबाजी से निकलने वाला जहरीला धुआं कोविड-19 रोगियों और दिल की बीमारी वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा है। सवाल है कि हानिकारक और व्यर्थ पटाखे पर अपना पैसा क्यों जलाया जाए? अगर हम गरीब बच्चों का पेट भरने के लिए इस राशि का उपयोग करते हैं, तो यह हमें पटाखे जलाने से ज्यादा खुशी मिलेगी और साथ में आशीर्वाद भी मिलेगा।

हरित पटाखे का उपयोग समस्या का हल नहीं निकालेगा। मैं राजनीतिक दलों से अपील करती हूं, जो भी आगामी चुनावों में जीतता है, वह जनता के सामने एक उदाहरण स्थापित करने के लिए पटाखे फोड़ने से परहेज करे।

सुप्रीम कोर्ट को पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के लिए राष्ट्रीय हरित पंचाट की अपील या अनुरोध को स्वीकार करना चाहिए और उन्हें अनुच्छेद-21 यानी जीवन का अधिकार और उचित स्वास्थ्य का अधिकार लागू करना चाहिए।

पटाखों के उपयोग को कम करने के लिए कुछ गंभीर कदम भी उठाए जाएं। लेकिन उन्हें भी ध्यान में रखा जाए जो पूरी तरह से पटाखे के व्यापार पर निर्भर रहते हैं अपनी आजीविका के लिए।
’खुशबू वेद, आलोट, मप्र

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