ताज़ा खबर
 

चौपाल: दर्पण में आंसू

जिस प्रकार डॉक्टर की नजर में मनुष्य के अंदर की भावना आंसू कहलाती और प्रकट होती है, उसी प्रकार ये आंसू साहित्यकारों के दिल से निकलती है। मनुष्य की आंखें भावनाओं का दर्पण हैं।

अब वह दिन दूर नहीं जब विलुप्त हो रहे आंसुओं पर इश्तिहार छपवाना पड़ेगा।

‘कहां गए वे आंसू’ पढ़ा। उसे पढ़ कर हरिशंकर परसाई की प्रसिद्ध व्यंग कथा ‘विकलांग राजनीति’ की याद आई। लेखक ने बड़े ही अलंकृत लहजे में समाज में खत्म होती भावनाओं को आंसू की उपमा से रेखांकित किया है। जिस प्रकार डॉक्टर की नजर में मनुष्य के अंदर की भावना आंसू कहलाती और प्रकट होती है, उसी प्रकार ये आंसू साहित्यकारों के दिल से निकलती है। मनुष्य की आंखें भावनाओं का दर्पण हैं। इसे लेखक ने आंसुओं का सहारा लेते अभिमान, क्षमा, पश्चाताप, आक्रोश एवं प्रसन्नता के आंसू को काफी सटीक तरीके से चित्रित करते हुए यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि अब मानवीय भावनाएं लुप्त हो रही हैं।

दूसरी ओर, किन्हीं के पास प्रवासी मजदूरों की पैदल यात्रा, गरीबी, भुखमरी, बदहाली, लाचारी की स्थिति में आंसू बहाने के लिए आंसू का भंडार शेष रहा ही नहीं है। लेखक ने आंसुओं के प्रकार को भी बड़े कलात्मक ढंग से विश्लेषित करते समाज के लोगों पर जो तंज कसा है, वह राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक संदर्भ में काफी उपयुक्त लगता है। उनका यह कहना कि अब तो आंसू के बहाने के अभिनय पर पुरस्कार दिए जाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। यह व्यवस्था मनुष्य को अपनी अंतरात्मा के दर्पण से बाहरी वातावरण को देखने का एक अवसर प्रदान करेगा, क्योंकि अब लोग बनावटी, घड़ियाली, बिकाऊ, तत्कालीन और अस्थायी आंसुओं को भी परिभाषित करने लगे हैं और इनके व्याकरण एवं मानकों की खोज की जा रही है।

मनुष्य की संवेदना क्यों आंसू के माध्यम से निकलती है? लेखक ने सही कहा है कि आंसू अमीरी-गरीबी, भाषा, प्रांत को देख कर नहीं आती है। अब इस देश में भावनाओं के मकान में सियासी रोटियां सेंकने के लिए राजनीतिक पार्टियों के महारथियों द्वारा कोरी काल्पनिक आंसू बहाना बदस्तूर जारी है। अब तो लगता है कि आंसुओं पर सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक प्रतिबंध लग गया है।

अगर कोई किसी के कष्ट में वास्तव में आंसू बहाता है तो समाज से ही तंज कसे जाने के कारण वह व्यक्ति घायल हो जाता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि समाज भी उसे किस प्रकार से उसे हृदय से आंसू बहाने की भी इजाजत नहीं देता है। ऐसी स्थिति आ गई है कि आंसुओं की राजनीति होने लगी है।
अब तो लगता है इस समाज में आंसू बहाने वालों के लिए लोगों के पास जाने की मात्र एक सीढ़ी बचती है- संवेदना। लेखक ने अपनी बातों से समाज को यह बताने का प्रयास किया है कि मानव की भावनाएं घटती जा रही है।
’अशोक, पटना, बिहार

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 चौपाल: चिंता के पायदान
2 चौपाल: लापरवाही का रेला
3 चौपाल: विचित्र वादा
ये पढ़ा क्या?
X