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नुमाइंदों पर खर्च

पंजाब की तरह केंद्र सरकार को भी सांसदों की पेंशन पर विचार करना होगा, ताकि हजारों करोड़ों रुपए की बचत करके जन कल्याणकारी कार्य किए जा सकें।

पंजाब में एक विधायक एक पेंशन से संबंधित विधेयक को मंजूरी प्रदान की गई है जो कि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में लिया गया स्वागतयोग्य कदम है। देश में पंजाब एकमात्र राज्य हो गया है जहां यह महत्त्वपूर्ण एवं दूरगामी परिणाम वाली व्यवस्था लागू की गई है। पंजाब के मुख्यमंत्री ने इस पर प्रसन्नता जाहिर की है और कहा कि पंजाब की जनता का भारी पैमाने पर धन बचेगा, जिसे जनता के हित में खर्च किया जाएगा।

देश के सभी राज्यों में जनप्रतिनिधियों को वे जितनी बार विधायक और सांसद बनते हैं, उसी अनुपात में पेंशन दी जाती है, जिस पर सरकार को अरबों रुपए खर्च करना पड़ता है। अब इस पर विरोध खड़ा हो गया है। देश में ऐसे उदाहरण हैं कि एक विधायक या सांसद पांच लाख रुपए तक की पेंशन का हकदार है। भारत की वर्तमान आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए इस तरह का प्रावधान सभी राज्यों को करना होगा और केंद्र को भी अपने सांसदों की पेंशन पर विचार करना होगा, ताकि हजारों करोड़ों रुपए की बचत करके जन कल्याणकारी कार्य किए जा सकें और जनता के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए समुचित प्रावधान किया जा सके।
वीरेंद्र कुमार जाटव, दिल्ली

कैसा मुफ्त

आजकल देश में मुफ्त की रेवड़ियों पर खूब चर्चा हो रही है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ, जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देश की जनता को मुफ्त की रेवड़ी के प्रति आगाह किया। इसके बाद जिसके बाद देश के विपक्षी दलों खासतौर पर आम आदमी पार्टी की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया आई। वास्तव में यह सोचने वाली बात है कि जनता को दी जाने वाली मुफ्त रियायतें क्या सच में देश की वित्तीय सेहत के लिए नुकसानदायक हैं। कोविड-19 के समय देश की जनता को मुफ्त राशन मुहैया कराया गया कराया, मुफ्त टीका दिया गया है। दिल्ली सरकार जो एक सीमा तक मुफ्त बिजली और मुफ्त पानी मुहैया कराती है। साथ ही गुणवत्तापूर्ण मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं दिए जाने पर जोर दे रही है।

क्या वास्तव में ये सारी सुविधाएं देश के विकास के लिए घातक हैं? आखिर संविधान निर्माताओं ने तो भारत की कल्पना एक कल्याणकारी राज्य के रूप में ही की है। प्रत्येक वर्ष भारत में हजारों करोड़ के बैंक घोटाले और फर्जीवाड़े हो रहे हैं। बढ़ती असमानता के बावजूद कारपोरेट टैक्स में कमी किए जाने से लगभग पांच लाख करोड़ के कर राजस्व में कमी हुई है। पिछले सात वर्षों में 11 लाख करोड़ के बैंक ऋण बट्टे खाते में डाल दिए गए। वास्तव में यह सोचने की बात है कि असल में देश में मुफ्त की रेवड़ी किसे दी जा रही है और उसका प्रकार क्या है?
अभिषेक पाल, आंबेडकर नगर, यूपी</p>

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