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चौपाल : स्त्री सुरक्षा का सवाल

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में करीब पैंतीस फीसद महिलाएं किसी ना किसी प्रकार की हिंसा का शिकार होती हैं।

Author Updated: October 19, 2020 4:23 AM
crime news Iqbal Singhप्रतीकात्मक तस्वीर।

देश में बलात्कार की जघन्य वारदातें जिस तेजी से बढ़ रही हैं और इस तरह की घटनाओं पर राजनीति हो रही है, इससे देश का हर नागरिक विचलित है। हर कोई पूछ रहा है कि आखिर कब रुकेंगी ऐसी घटनाएं। बेटी किसी की भी हो, वह बेटी तो भारत माता की ही है, तो फिर इस पर राजनीतिक क्यों हो रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में करीब पैंतीस फीसद महिलाएं किसी ना किसी प्रकार की हिंसा का शिकार होती हैं।

हैरानी की बात यह है कि जिस सोशल मीडिया का अधिकतम दुनिया उपयोग करती हैं, उसी पर दुनिया की करीब साठ प्रतिशत महिलाओं के साथ हिंसात्मक व्यवहार देखने को मिल रहा है। भले यह हिंसा शारीरिक न हो, लेकिन इस आॅनलाइन हिंसा का शिकार हुई महिलाओं की मानसिक स्थिति भी शारिरिक हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं जैसी ही हो जाती है।

सोशल मीडिया पर हिंसा का शिकार होने के कारण बीस प्रतिशत महिलाओं को अपना सोशल मीडिया अकाउंट बंद भी करना पड़ता है। गौरतलब है कि यह सर्वे भारत सहित बाईस देशों की चौदह हजार से ज्यादा महिलाओं के बीच किया गया था। सर्वे के मुताबिक उनतालीस प्रतिशत महिलाओं के साथ आॅनलाइन हिंसा की घटनाएं फेसबुक पर होती हैं, जबकि इंस्टाग्राम पर हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं की संख्या तेईस प्रतिशत है।

चौदह प्रतिशत महिलाओं के साथ व्हाट्सएप के माध्यम से हिंसा की जाती है, जबकि स्नैपचैट पर दस प्रतिशत, ट्विटर पर नौ प्रतिशत और छह प्रतिशत अन्य ऐप के माध्यम से महिलाओं को हिंसा का सामना करना पड़ता है। इसी वर्ष दिल्ली और आसपास के शहरों में किए गए एक सर्वे में पता चला कि इंटरनेट पर महिलाओं के साथ हिंसा के मामले छत्तीस प्रतिशत तक बढ़ गए हैं, जबकि आॅनलाइन हिंसा के मामलों में सजा की दर चालीस प्रतिशत से घट कर पच्चीस प्रतिशत रह गई है।

सबसे दुखद तो यह है कि आॅनलाइन हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं की स्थिति असल जिंदगी में हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं से भी ज्यादा खराब हो जाती हैं। हिंसा अगर किसी वर्चुअल प्लेटफार्म पर हो रही है तो भी वह असल जिंदगी में होने वाली हिंसा जितनी ही खतरनाक है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का मकसद तो लोगों को एक दूसरे के करीब लाना होता है, परंतु अब यह कुछ और ही मोड़ लेता जा रहा हैं।

आनलाइन हिंसा और छेड़छाड़ के बढ़ते मामलों के कारण ही अब करीब उनसठ प्रतिशत महिलाएं अपने अकाउंट को प्राइवेट रखना ही पसंद करती हैं। महिलाओं के प्रति असुरक्षा और भेदभाव की जो स्थिति हमने अपने असली समाज में पैदा की है, वही स्थिति अब सोशल मीडिया की आभासी दुनिया पर भी हावी होने लगी है। कुल मिला कर महिलाओं के साथ छेड़खानी जैसी घटनाएं अब सिर्फ घर के बाहर ही नहीं होती, बल्कि सोशल मीडिया पर भी महिलाओं को ही ऐसी घटनाओं का सामना करना पड़ता है।

आज से बीस वर्ष पहले जब अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की शुरूआत हुई थी, तब कहा गया था कि यह आभासी दुनिया सबको बराबरी का मौका देगी, यहां महिलाओं और पुरुषों के बीच कोई भेदभाव नहीं होगा। लेकिन आज हकीकत यह है कि सोशल मीडिया ही समाज के अलग अलग वर्गों के साथ भेदभाव का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।

भविष्य के लिए सोचा था कि डिजिटल दुनिया में तो शायद महिलाओं को सम्मान मिलेगा, लेकिन अफसोस यह है कि डिजिटल दुनिया में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा और उनका अपमान अब सारी सीमाएं लांघने लगा है, जिसके खिलाफ पीड़ित महिलाओं को अवश्य ही आवाज उठानी चाहिए।
’निधि जैन, लोनी (गाजियाबाद)

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