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दहेज की आग

विकास और सभ्यता के पायदान पर तेजी से सफर के बरक्स दहेज मृत्यु से संबंधित कड़े कानून होने के बावजूद इस अपराध की दर में कमी नहीं आ रही है।

सांकेतिक फोटो।

विकास और सभ्यता के पायदान पर तेजी से सफर के बरक्स दहेज मृत्यु से संबंधित कड़े कानून होने के बावजूद इस अपराध की दर में कमी नहीं आ रही है। सख्त कानून और अनेक निर्णयों के बाद भी वर पक्ष के लोगों के मन में जरा-सा भी भय नहीं दिखता। यह समस्या केवल पिछड़े माने जाने वाले समुदायों में नहीं है। मलाल इस बात का है कि पढ़े- लिखे लोग भी इस दहेज रूपी अग्नि को भड़काते और उसमें जलते दिखते हैं। इस आग ने न जाने कितनी बेटियों की जिंदगी छीन ली है। ऐसा लगता है कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे नारे सिर्फ जुमला बन कर रह गए हैं और लोग अपनी मर्जी से कुप्रथाओं को पाल-पोस रहे हैं।
’कल्पना झा, फरीदाबाद, हरियाणा

अभाव की मार

मानव को जिंदा रहने के लिए संवाद और अनेक वस्तुओं की आवश्यकता होती है। जैसे जैसे समाज में परिवर्तन आता है, वैसे-वैसे हमारी आवश्यकताएं भी बदलती जाती हैं। लेकिन बीते वर्ष आई महामारी ने कई लोगों को इतना मजबूर बना दिया कि अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए व्यक्ति चोरी करने, बच्चों को अगवा कर उनके घर वालों से पैसों की मांग करने जैसे आपराधिक कृत्य करने लगे। यहां तक कि कई लोग भुखमरी का शिकार हो गए। सरकारों ने अपने-अपने प्रदेश में राशन बंटवाना, मुफ्त भोजन करवाना और अन्य सामाजिक कार्यक्रम शुरू किया। लेकिन इसकी सीमा साफ दिखी। ऐसे में जनता का खयाल रखने का हवाला देकर पूर्णबंदी को खोल दिया गया, लेकिन अभी भी बहुत बड़ी तादाद में लोग बेरोजगार हैं। आम जिंदगी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं।
’कलश तिवारी, सरिता विहार, दिल्ली

मानसून का इंतजार

वैसे मानसून को लेकर कहा जा रहा था कि मानसून अच्छा रहेगा और समय पूर्व आएगा। जून से इसका आगाज भी हो चुका था और लोगों के चेहरे खिल गए थे। खासकर किसानों के। लगने लगा था मानसून सक्रिय हो गया है। मगर जुलाई आते-आते हर कोई आसमान पर निगाहें गड़ाने लगे, क्योंकि बरसात के आसार कहीं नजर नहीं आ रहे हैं और लोग गर्मी से परेशान हैं। गर्मी ऐसी कि पंखों की तो हवा ही पता नहीं चल रही है। लू चलने की खबरें आ रही है। अच्छा और समय पर मानसून आना हमारे लिए बेहद जरूरी है, क्योंकि देश के आर्थिक विकास की रफ्तार और दशा-दिशा भी काफी हद तक मानसून फर निर्भर करती है। मौसम में आते बदलाव, तपता सूरज और गर्म होती धरती के मसले पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा।
’साजिद अली, चंदन नगर, इंदौर

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