चौपाल: शिक्षा की सूरत

हम शिक्षा के अधिकार कानून की बात करें तो यह कानून 2010 में पारित हुआ था और इसकी व्यवस्था के अनुसार छह से चौदह वर्ष आयु के बीच के सभी बच्चों को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना आवश्यक है

Boyस्‍कूल से बाहर निकलते बच्‍चे। फाइल फोटो।

भारत को स्वतंत्रता मिलने के तिहत्तर वर्ष बाद भी हमारी शिक्षा के प्रति कामचलाऊ सोच ही चल रही है। इस उपेक्षा का परिणाम यह हुआ कि अभी तक हमारे देश में लगभग तैंतीस लाख लोग अशिक्षित हैं। सही मायने में यह कहें कि साक्षर नहीं है। मतलब तैंतीस लाख लोगों को अपना नाम तक लिखने नहीं आता और जिन्हें अपना नाम लिखने आ जाता है, उन्हें सरकार अपने साक्षरता के रजिस्टर में डाल देती है। इस हिसाब से हमारे देश में चौहत्ततर फीसद तक साक्षरता पहुंच सकी है। लेकिन निरक्षरता में कमी जनसंख्या में वृद्धि अनुपात में नहीं हो पाई है। 2001 से 2011 तक के बीच सात वर्ष आयु के ऊपर की जनसंख्या में अठारह करोड़ पैंसठ लाख इजाफा हुआ है, पर निरक्षरता में कमी सिर्फ तीन करोड़ ग्यारह लाख ही दर्ज हुआ।

अगर हम शिक्षा के अधिकार कानून की बात करें तो यह कानून 2010 में पारित हुआ था और इसकी व्यवस्था के अनुसार छह से चौदह वर्ष आयु के बीच के सभी बच्चों को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना आवश्यक है। मगर इसमें हम सफल नहीं हो पा रहे हैं। विद्यालयों और शिक्षकों की भारी कमी के अलावा जो हैं भी, उनमें से अधिकतर विद्यालयों में न तो बिजली की व्यवस्था है, न शौचालयों की। हाल ही में एक खबर में सरकारी विद्यालयों का आंकड़ा दिया गया था कि ग्यारह हजार प्राथमिक स्कूल पूरी तरह से जर्जर हैं और ग्यारह लाख चालीस हजार स्कूलों की और छह लाख अट्ठानबे हजार कक्षाओं की मरम्मत कराने की जरूरत है।

माना कि बच्चों को मैदान में बिठा कर पढ़ा लिया जाता है, लेकिन इस तरह पढ़ाने के लिए भी तो कोई शिक्षक चाहिए! अधिकतर प्राथमिक विद्यालयों में केवल दो से तीन शिक्षकों की ही मात्र नियुक्ति की गई है। उन्हें पढ़ाना होता है पांच कक्षाओं को। इन्हीं सब समस्याओं के कारण गांव में एक हजार में से तीन सौ छब्बीस और शहरों में एक हजार में से तीन सौ तिरासी बच्चे बीच में ही स्कूल या पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर हैं।

और इसी कारण साक्षरता और शिक्षा के मामले में भारत की गिनती दुनिया के पिछड़े देशों में होती है। अगर हम अपने देश की तुलना आसपास के देशों से करें तो हम चीन, श्रीलंका, म्यांमा ईरान से भी पीछे हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि सरकार शिक्षा पद्धति के बारे में पुनर्विचार करे और उसे नए सिरे से तराशे। अब किसी भी कारण को बहाना बनाने से नहीं चलेगा।
’अनुराग कुमार, मुखर्जी नगर, दिल्ली

भ्रष्टाचार की तहें

एक खबर के मुताबिक सन 2017 फोर्ब्स एशिया के पांच सबसे रिश्वतखोरी देशों की सूची में भारत को प्रथम स्थान प्राप्त है, जबकि पाकिस्तान को चौथा स्थान मिला है। जिस दौर में हमारे देश में भ्रष्टाचार को दूर कर देने के दावे किए जा रहे हैं, उसमें यह तस्वीर चिंताजनक और अफसोसनाक है। यही कारण है कि भारत आज दुनिया के अग्रणी देशों की सूची में स्थान पाने से वंचित है।

यहां तक कि वियतनाम, थाईलैंड जैसे देश भी रिश्वतखोरी की समस्या के संदर्भ में भारत के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं।
हमारे देश में प्रतिभावान व्यक्तियों की कोई कमी नही है। हर क्षेत्र में प्रतिभाओं की भीड़ लगी है। लेकिन मूल समस्या यह है कि हमारी व्यवस्था में ही खोट आ चुकी है। आज एक विद्यार्थी कोई परीक्षा पास भी कर जाता है तो उसे आसानी से नियुक्त नहीं मिलती है। कई बार बिना रिश्वत के काम नहीं चलता। आज अधिकतर विद्यार्थी बेरोजगार हैं तो रिश्वतखोरी के कारण।

हाल ही में 2020 का व्यापार और रिश्वत जोखिमों की वैश्विक रिपोर्ट आई, जिसमें भारत को मात्र पैंतालीस अंक मिले। यानी छिहत्तर देश रिश्वत की समस्या से निपटने के मामले में हमसे काफी अच्छे हैं। हालत यह है कि अच्छे स्कूलों में नामांकन के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है।

सरकारी दस्तावेजों को वैध तरीके से हासिल करने के लिए भी अघोषित रूप से रिश्वतखोरी का सामना करना पड़ता है। सरकार को इन सब चीजों की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। इस समस्या के बने रहने से लोगों का मनोबल गिरता है। सरकार रिश्वतखोरों और रिश्वतखोरी पर शिकंजा कसे, तब जाकर हम एक प्रगतिशील समाज की कल्पना कर सकते हैं।
’सचिन आनंद, खगड़िया, बिहार

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