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छेड़खानी का रास्ता

मनचलों की छींटाकशी से तंग आकर लड़कियों ने अपने गांव में ही बारहवीं तक स्कूल खोलने की मांग की और अनशन पर बैठ गर्इं।

Author May 23, 2017 05:37 am
चित्र का इस्तेमाल केवल प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है।

साइबर सुरक्षा

हाल ही में रैंसमवेयर वायरस ने भारत सहित लगभग डेढ़ सौ देशों में सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों के कंप्यूटर ठप करके दुनिया भर में हड़कंप मचा दिया। इस वायरस के हमले से विश्व के सामने एक नए प्रकार की चुनौती खड़ी हो गई है। इससे साफ है कि साइबर सुरक्षा को लेकर सभी देशों ने एकजुट होकर गंभीरता नहीं दिखाई तो ऐसे हमले दुनिया में तहलका मचा सकते हैं।

रैंसमवेयर से सबसे ज्यादा प्रभावित ब्रिटेन हुआ है। उसके नेशनल हेल्थ सर्विस से जुड़े कंप्यूटर्स को निशाना बनाया गया। इसके तहत हैकर्स ने लंदन, ब्लैकबर्न और नॉटिंघम जैसे शहरों के अस्पतालों और ट्रस्ट के कंप्यूटर्स को निशाना बनाया। कंप्यूटर के डाटा नहीं खुलने के चलते अस्पतालों और क्लीनिकों को मरीजों को वापस भी भेजना पड़ा। हैकर्स ने फिरौती की रकम की मांग बिटक्वाइन के रूप में की ताकि उन्हें आसानी से नहीं पकड़ा जा सके। इस हमले के पीछे किसका हाथ है यह फिलहाल निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसके पीछे उत्तर कोरिया की संभावित भूमिका को भी खारिज नहीं किया जा सकता है। गौरतलब है कि उत्तर कोरिया के लिए काम करने वाले लैजरस हैकर्स का नाम पहले भी कई बार साइबर अपराधों में सामने आ चुका है। इसके मद्देनजर अब संचार तकनीक के गलत उपयोग पर रोक लगाने की तैयारी करनी होगी।
’कुशाग्र वालुस्कर, भोपाल
छेड़खानी का रास्ता

हरियाणा में रेवाड़ी के गोठड़ा टप्पा डहीना गांव में लड़कियों को दसवीं से आगे की पढ़ाई करने के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता था जिसके रास्ते में लड़के छेड़खानी करते थे। मनचलों की छींटाकशी से तंग आकर लड़कियों ने अपने गांव में ही बारहवीं तक स्कूल खोलने की मांग की और अनशन पर बैठ गर्इं। मामला सरपंच से होता हुआ जिले के अफसरों तक पहुंचा मगर कुछ नहीं हुआ। आखिर लड़कियों ने भूख हड़ताल कर दी। तब कहीं जाकर सरकार जागी और गांव के स्कूल में बारहवीं तक पढ़ाई शुरू करने का आदेश दे दिया। अब सब लोग खुश हैं कि लड़कियां अपने गांव में ही आगे की पढ़ाई कर सकेंगी, उन्हें दूसरे गांव नहीं जाना पड़ेगा और वे छेड़खानी से बच जाएंगी।

यहां सोचने वाली बात है कि छेड़खानी करने वाले वे लड़के आखिर किस दुनिया से आए हैं? क्या अब भी हमारे समाज की मानसिकता इतनी संकीर्ण है कि बेटियां सिर्फ इसलिए आगे पढ़ने नहीं जा सकतीं कि उन्हें छेड़खानी सहनी पड़ती है! क्या वे लड़के हमारे समाज का हिस्सा नहीं हैं? क्या वे हमारे ही बेटे नहीं हैं? आज जरूरत है हमें अपनी मानसिकता बदलने की ताकि फिर से बेटियों को भूख हड़ताल पर न बैठना पड़े।
’बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

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