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चौपालः जात न पूछो

हमारे देश की अनेक समस्याओं की जड़ समाज का सैकड़ों जातियों-उपजातियों में बंटा होना है। यहां बच्चे के होश संभालते ही मां-बाप सबसे पहले उसे उसकी जाति से परिचित कराते हैं।

Author October 30, 2018 11:38 AM
समाज से जाति नामक इस बड़ी बुराई को समाप्त करने के लिए सभी को शिक्षित और स्वावलंबी होना पड़ेगा क्योंकि गरीब, अशिक्षित और अंधविश्वासी लोगों को धर्म के ठेकेदार और सत्ता के मठाधीश बहुत आसानी से जाति और धर्म के नाम पर बांट कर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं।

जात न पूछो

संपादकीय ‘जड़ता की जाति’ (17 अक्तूबर) पढ़ा। जातिवाद दरअसल भारतीय समाज के खून में रच-बस गया है। जातिवादी जड़ता की वजह से भारतीय समाज में फूट के चलते हमारा देश हजारों वर्षों तक गुलाम रहने को भी अभिशप्त रहा। यह देश शकों, हूणों, यूनानियों, अफगानों, पठानों, मंगोलों, मुगलों, अंग्रेजों, यहां तक कि गुलाम वंश का भी गुलाम रहने को अभिशप्त रहा। अफसोस की बात है कि स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी हमारा देश जातिवाद के जहर से मुक्तनहीं हुआ है बल्कि राजनीति और धर्म के ठेकेदार आज भी अपनी सत्ता कायम रखने की खातिर जातिवादी व्यवस्था को जीवित रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं।

हमारे देश की अनेक समस्याओं की जड़ समाज का सैकड़ों जातियों-उपजातियों में बंटा होना है। यहां बच्चे के होश संभालते ही मां-बाप सबसे पहले उसे उसकी जाति से परिचित कराते हैं। समाज में मौजूद जातियों के आरोही क्रम में उसकी जाति की क्या हैसियत है, यह भी उसे ठीक से समझाया जाता है। जबलपुर में कथित दलित जाति के डॉक्टर गीतेश रात्रे से शर्मनाक गालीगलौज, मारपीट और अपमानजनक व्यवहार उसी जातिवादी व्यवस्था को मस्तिष्क में ठूंस-ठूंस कर भरे जाने का दुखद परिणाम है। मजे की बात है कि किसी भयंकर प्राणांतक बीमारी में वह कथित सवर्ण मरीज इलाज के लिए सवर्ण डॉक्टर की मांग नहीं करता! हमारे समाज में प्राय: किसी की काबिलियत का पैमाना उसकी योग्यता न होकर उसकी जाति है। इसीलिए तमाम कार्यस्थलों पर भी कथित छोटी जाति के लोगों को घुटन और जलालत भरे माहौल में कार्य करने को मजबूर होना पड़ता है। ऐसी कठिन और अपमानजनक परिस्थिति में कोई भी अपनी सर्वोत्तम कार्यदक्षता दिखा ही नहीं सकता।

समाज से जाति नामक इस बड़ी बुराई को समाप्त करने के लिए सभी को शिक्षित और स्वावलंबी होना पड़ेगा क्योंकि गरीब, अशिक्षित और अंधविश्वासी लोगों को धर्म के ठेकेदार और सत्ता के मठाधीश बहुत आसानी से जाति और धर्म के नाम पर बांट कर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। फिर भी, आज समाज कुछ बदल रहा है, उसकी सोच बदल भी बदल रही है। युवा पीढ़ी में जात-पात और धर्म के बंधनों से मुक्त होकर अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियां अब खूब हो रही हैं। भारत में जातिवाद समाप्त करने का यह एक अच्छा उपाय है। लेकिन अफसोस की बात है कि धर्म के नाम पर लूट मचाने वाले उसके कथित ठेकेदार और जातिवाद की बैसाखी थाम कर चुनाव जीतने वाले राजनीति के रंगबाज ऐसे अंतरजातीय और अंतरधर्मीय विवाह करने वाले साहसी जोड़ों को कभी लव जिहाद, कभी ‘खाप’ तो कभी परिवार की प्रतिष्छा पर दाग बता कर उनकी हत्या तक करा देते हैं ।अब पानी सिर से गुजर रहा है लिहाजा, समाज के प्रबुद्ध लोगों को संगठित होकर यह संदेश देना होगा कि मनुष्य की एकमात्र जाति है मनुष्यता और दुनिया का इकलौता धर्म इंसानियत।

निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

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